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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished726 pages

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Page 145

चित्रदीपप्रकरणम् १२७
. पर्वतादि का चिदाभास नहीं होता है किन्तु] जो देवादि देहधारी
चैतन्य में अध्यस्त हैं, उन्हीं के पृथक्-पृथक् जीवनामक चिदाभास
कल्पित कर लिये जाते हैं । [ उनके चिदाभास की कल्पना का
कारण तो यह है कि देव, तिर्यङ्, मनुष्यादि के शरीर को पाकर]
ये जीव ही तो अनेक प्रकार से संसार में चक्कर लगाया करते
हैं [ निर्विकार रहने के कारण वह परमात्मा संसार में नहीं
फंसता ] ।
वस्त्राभासस्थितान् वर्णान् यद्वदाधारवस्त्रगान् ।
वदन्त्यज्ञास्तथा जीवसंसारं चिद्गतं विदुः ॥८॥
उन बनावटी कपड़ों में जो रंग भरे हैं उनको भी जैसे
अज्ञ लोग आधार वस्त्र के ही रंग कहने लगते हैं, ठीक इसी
प्रकार सम्पूर्ण वादी लोग तथा सब लौकिक लोग मिलकर,
अपने अज्ञान से वृथा ही कहने लगे हैं कि चेतन आत्मा ही
संसार में फंस गया है [विचार कर देखने से तो यह संसार जीव
का ही है । आत्मा नाम का तत्व कभी संसार में नहीं फंसता ।]
चित्रस्थपर्वतादीनां वस्त्राभासो न लिख्यते ।
सृष्टिस्थमृत्तिकादीनां चिदाभासस्तथा न हि ॥९॥
चित्र में जो पर्वतादि होते हैं उनका जैसे चित्र में वस्त्रा-
भास नहीं खींचा जाता, इसी प्रकार सृष्टि में जो मिट्टी आदि हैं
उनमें भी चिदाभास नहीं होता ।
संसारः परमार्थोऽयं संलग्नः स्वात्मवस्तुनि ।
इति भ्रान्तिरविद्या स्याद् विद्ययैषा निवर्तते ॥१०॥
[देहादि को ही आत्मा मानने वाले कहते हैं कि] यह संसार
परमार्थ है । अपने आत्मा में [आत्माराधन में] ही यह संसार