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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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Page 144

१२६ पञ्चदशी
ब्रह्मा से लेकर स्तम्बपर्यन्त चेतन प्राणी तथा गिरि, नदी.
आदि जड जगत्, जो कि इस परमात्मा में ऊँच नीच भाव से
रह रहा है, ठीक ऐसा ही है जैसे कि कपड़े के चित्र हों और
वे आपस में एक दूसरे से उत्तम वा अधम हों। [कपड़े के चित्रों
का उच्च नीच भाव जैसे परिणाम में निकम्मा है इसी प्रकार
प्राणियों का उच्च नीच भाव भी वेमतलव है। उच्च नीच कोई
नहीं है, ये सब जीव अनन्त को पाने में लगे हुए हैं, जिसने उसे
जितना पा लिया है वह उतना उच्च है। न पानेवाला नीच है ।
उच्च नीच उसको पाने या न पाने की ही अवस्थायें हैं। विद्या-
लय और महाविद्यालय में पढ़ने वाले छोटे बड़े छात्रों में जैसे
उच्च नीच भाव नहीं गिना जाता है । यही अवस्था इस संसार
रूपी महाविद्यालय के विद्यार्थी सब प्राणियों की है ।]
चित्रार्पितमनुष्याणां वस्त्राभासाः पृथक् पृथक् ।
चित्राधारेण वस्त्रेण सदृशा इव कल्पिताः ॥६॥
पृथक् पृथक् चिदाभासाश्चैतन्याध्यस्तदेहिनाम् ।
कल्प्यन्ते जीवनामानो बहुधा संसरन्त्यमी ॥७॥
[ यों तो चित्र में पर्वत, वृक्ष, मनुष्य आदि सभी होते हैं
परन्तु ] चित्र में जो मनुष्यशरीर होते हैं उस चित्र में केवल
उनके ही पृथक् पृथक् रंग विरंगे कपड़े, उस चित्र के आधार-
वस्त्र के समान दीखनेवाले बनाये जाते हैं [ उस चित्र में पर्व-
तादि के कपड़े नहीं बनाये जाते । चित्र के वे कपड़े भी कपड़े
नहीं होते । वे तो बनावटी कपड़े होते हैं। उन कपड़ों से किसी
के शीत आदि का निवारण नहीं होता ]। ठीक इसी प्रकार