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सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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द्वैतविवेकप्रकरणम् ११३
तुझे दुगना क्लेश अब हो गया है। अरे भाई, तेरा बोधवैभव
भी विचित्र ही है [ परमात्मा करे ऐसा बोध किसी को
भी न हो।]
विड्वराहादितुल्यत्वं मा कांक्षीस्तत्वविद् भवान् ।
सर्वधीदोषसन्त्यागाल्लोकैः पूज्यस्व देववत् ॥५७॥
(तुम अब तत्वज्ञानी हो गये हो तो मैला खाने वाले सूकरादि
अधम प्राणियों के समान होना मत चाहो) किन्तु सब ही दोषों
को छोड़ कर देवताओं की तरह पूजो।
यदि तुम तत्वज्ञानी हो गये हो—सर्वाधिक उत्कर्ष का कारण
ज्ञान यदि तुम्हें प्राप्त हो गया है—तो कामादि को त्याग देने की
असमर्थता के कारण, निकृष्ट से निकृष्ट ग्रामसूकर आदि के
तुल्य मत हो जाओ। जिन काम क्रोधादि में ग्राम के सूकर
आदि अधम प्राणी भी फँस रहे हैं, तत्वज्ञानी होकर तुम उन
काम क्रोधादि में मत फँसे रहो। किन्तु कामादि नाम के जितने
भी मनोदोष हैं, उन सब को छोड़ कर देवता के समान सब लोगों
के पूज्य हो जाओ। तत्वज्ञान का इतना तो दृष्ट फल भी होना
ही चाहिये। (तत्वज्ञान की चार बातें मुँह से निकालकर भी
यथेष्टाचारी होने से हमारी अपनी ही हानि नहीं होती, प्रत्युत
तत्वज्ञान का मार्ग बदनाम होता है) इससे लोगों को घृणा होती है
और बहुत से साधक हमारे पापाचार को देखकर इस मार्ग में
आने से परहेज़ करने लगते हैं। यों हमारे यथेष्टाचरण से
अकल्पित अनन्त हानियाँ होती हैं ।
काम्यादिदोषदृष्ट्याद्याः कामादित्यागहेतवः ।
प्रसिद्धा मोक्षशास्त्रेषु तानन्विष्य सुखी भव ॥५८॥