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क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र)

क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र)

Krantibeej (Parables and Inspiring Letters)

by ओशो (आचार्य रजनीश)

Source: क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र) · जीवन जागृति केंद्र / ओशो इंटरनेशनल · 1970 (origin)

DevanagariHindipublished73 pages

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इस 'ज्ञान' का नाम चाहे कितना उछालो जी, पर तत्व तो केवल ज्ञान ही; सो ज्ञान मात्र स्वयं
सिद्ध है, उसे कोई मिटाने वाला नहीं।
यह प्रत्यक्ष जाना प्रयोजनवान ही रहा, इसलिए ही तो पहले कहा कि 'ज्ञान' मात्र
कहकर 'ज्ञेय' का नाम मात्र भी नहीं निकाला कि जैसा जो भाया, वैसा जाना सो यह
भी ज्ञान रूप ही रहा तथा अन्य भिन्न प्रकार से प्रतिपादन भी किया ही, सो ऐसा
अभ्यास ही प्रत्येक का होना रहा।
इसलिए तो 'ज्ञान' मात्र कहा गया कि केवल उस ज्ञान को ग्रहण किया गया
कि जिसके बल से समस्त का स्वरूप ही सिद्ध हो जाता गया होता ही, उस स्वरूप मात्र
पर ही तो ठहरना रहा प्रत्येक का, केवल ही जो स्थिर ही ठहरा सो, अपने स्वरूप
मात्र रहा ज्ञान रूप ही तो 'ज्ञान' का नाम ही रहा सिद्ध हुआ कहा गया जो कि केवल
स्वकीय रूप, सो तो सदा ही तो सब ही को 'ज्ञान' का यह नाम ही तो सिद्ध ही
सो प्रमाण ही कहा गया रहा।
वास्तव में जहां गैर- भाव असम्भव ही रहता तो वहां सत्य ही तो ही रहा
गया सो, सो सत्य ही कहा गया, जो प्रत्येक का ही सर्व ही रूप से ग्रहण किया
गया प्रकाश रूप ही।
तो 'ज्ञान' का ही स्वरूप तो सत्य ठहराया ही, सो असत्यता का कोई भी
अभाव ही रहा सो 'ज्ञान' का स्वरूप- असत्यता से, सदा ही, पृथक ही, पृथक
रहा सो प्रकाश के स्वरूप मात्र प्रकाश ही तो प्रकाश कहा गया, सो तो केवल
सिद्ध मात्र ही रहा सब का ही सो अप्रमेय असत्यता से, तो सत्य का स्वरूप
ही प्रकाश का स्वरूप ही प्रकाश मात्र रहा।
118/ 'सर्वव्यापी तो स्वयं ही ही रहा, ना कि असत्यता का
असत्यता ही'
शून्य को जब शून्य ठहराया ही, तो शून्य का रूप शून्य ही रहा ठहरा, पर
शून्य ठहराने वाला ज्ञान मात्र था सो व्यापक ही तो स्वयं ही ठहराया ही कहा
रहा।
शून्य का रूप तो सब प्रकार से स्वरूप शून्य रहा कहा असत्यता ही
प्रकार से शून्य स्वरूप ठहरा स्वरूप व्यापक रहा तो स्वरूप ठहराने वाला
ज्ञान मात्र था सो असत्यता स्वरूप नहीं था, सो प्रत्यक्ष ही स्वयं स्वरूप ही
असत्यता को शून्य रूप ही ठहरा ठहराया, जिसने शून्य को जाना व कहा,
ज्ञान स्वरूप ज्ञान-रूप रहा जो कि शून्य रूप नहीं सो सत्य ही ठहरा सो, सो
तो रूप ही रहा, ज्ञान का स्वरूप ठहरा ज्ञान ही तो सत्य का स्वरूप ही ठहरा
सिद्ध सत्य रहा सो ज्ञान, ना कि शून्य का स्वरूप रहा, ना तो असत्य ही
ठहराया 'ना' ही था, 'ज्ञान' का स्वरूप ठहरा तो ज्ञान ही, ना तो रूप ही शून्य था,
ज्ञान का, मात्र रूप तो, ज्ञान रहा।
स्वरूप तो रहा ही, 'सत्य ही ठहर रहा ज्ञान स्वरूप का स्वरूप, पर
स्वरूप का ना रहा सो असत्य'।
रूप तो सत्य स्वरूप ठहरा ही रहा सो स्वरूप स्वरूप ही, सो स्वरूप ही
सत्य रहा तो सब प्रकार सिद्ध ही, सो स्वरूप ही, स्वरूप ही तो सब रूप कहा सो,
सब ही स्वरूप का स्वरूप रूप ही तो सत्य रहा।
सो असत्यता का तो ना कोई रूप ठहरा सो स्वरूप ही स्वरूप ज्ञान
ज्ञान स्वरूप ही रहा ज्ञान असत्यता का केवल ही सत्य स्वरूप रहा सत्य ही
रहा स्वरूप स्वयं का सब का ही सत्य ही रहा सो, सब ही सत्य ही स्वरूप
मात्र सत्य मात्र रहा ज्ञान मात्र सब रूप सत्य ठहरा हुआ सो ही सत्य रहा सो,
'सत्य, ना असत्यता का रूप, ना सत्य शून्य रहा; ना तो असत्यता का रूप, ना
सत्य शून्य ही स्वरूप का रूप रहा'।
रूप तो ही स्वरूप सो ज्ञान सत्य स्वरूप मात्र ठहरा असत्यता का रूप
असत्यता का ठहरा रूप मात्र रूप ज्ञान स्वरूप रहा सो 'असत्यता ही
मात्र ना तो ना ठहरा, ना ही असत्यता का असत्यता रूप ही असत्यता
स्वरूप का रूप रहा, ना ही तो असत्य ही ठहरा सो, ना तो असत्यता रूप
असत्य रूप रहा हो?'
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