क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र)
Krantibeej (Parables and Inspiring Letters)
by ओशो (आचार्य रजनीश)
Source: क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र) · जीवन जागृति केंद्र / ओशो इंटरनेशनल · 1970 (origin)
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Read in contextमाता-पिता पारिवारिक सम्बंध तथा इस रस द्वारा सांसारिक जीवनपर्यन्त जो
सुखानुभव प्राप्त कर रहे थे उन सब आत्मिकसुखप्रद आनन्द रूपी रसयुक्त मधुर सम्बंध,
सम्बन्ध को काल-रूपी विष का मिश्रण करके इस प्रकार नष्ट भ्रष्ट कर दिया जाता
पश्चात् जिस सांसारिक जीव को सुख दुःख देने का निमित्त सम्बन्ध जोड़ा था वह सम्बन्ध
रहा ही नहीं, सदा रहने वाला, अमर तो केवल एक परमात्मा ही सत्यस्वरूप है, सो ही सत्य पदार्थ
मानव तन द्वारा प्राप्त हो सकता, सो ही सच्चा सुखदायक है जो सदा रहता है जो सुख अपने साथ
परलोकपर्यन्त अखण्ड सुख- रस पहुँचा सकता है, इसलिए उसका त्याग
093/ कर्तव्य
भाई लोगो, जिस का कर्त्तव्य हो उसको तो पूरा करना हमारा धर्म तथा इन्सानियत
धर्म माना ही जाता है सो, पर मनुष्य इन्सान बनकर अपने धर्म को तो भूल गया कि मेरा धर्म
इन्सान का मानव का केवल उदर पोषण का साधन मात्र करना ही? जो सब जीव पशु पक्षी भी, तो फिर
पशु मानव अन्तर क्या?
सो मनुष्य विचार शक्ति द्वारा अपने कर्तव्य को भूल कर संसारिक अन्य सांसारिक
रस को भोग करके स्वयं असन्तोषी बना सो सब दुःख का मूल बन गया जिसका फल यह पाया
सुख की जगह दुःख भोगना ही? पर कल्याण जन-हित सुख की भावना जो लोक-कल्याण की
भावना द्वारा अखण्ड आनन्द सुख को पहुँचा सकती, उस का विचार ही, त्याग दिया, निज,
परमार्थ, का कल्याण का परोपकार का रूप ही त्याग दिया! केवल अपना ही पेट भरना
चाहा, सो किया; जिससे मन चंचलताई के वश होकर अन्य सब को तो सो तो, पर खुद को
आप ही कष्ट दिया जा रहा! पर अपने को सब कुछ ज्ञानी समझ रहा।
जब संसार सुखमय था तब सुखद भावनाएँ थीं सब सुखी रहते, किसी को
दुःखदायी बात केवल पेट पालन तक सीमित ज्ञान न होकर कल्याण पर, सो परोपकार के
कार्यकलापों द्वारा सब सुखी थे सो कारण सुख का था तथा जीवन सुखमय व्यतीत था
सुख दाता विचार मन में जागृत या वास हुआ मन निर्मल था जिस का लाभ, कि मनमुख
जीव संसार व संसार सुख की इच्छा को त्याग कर चला, पर सन्मुख जीव संसार व सांसारिक
सुख 'ज्ञान' द्वारा नष्ट कर मन को शान्ति प्रदान किया
'ज्ञान' पर तन मन धन अर्पण कर दिया, 'ज्ञान' दाता को सब का स्वामी माना
094/ संसार सुख का त्याग
जब मानव विचार शक्ति द्वारा सन्त महापुरुषों की शरण ग्रहण कर सन्मुख बना तो
सब कुछ त्याग कर सन् मुख भाव रूपी साधन अपनाया जो उस का साधन बना सो सब त्यागने
योग्य-वस्तुएँ ज्ञान थी, सो असत्यता को त्याग कर सन्मार्ग अपनाया सो ही सब कुछ सुख
मन-मुख होकर मन की इच्छा सांसारिक विचार द्वारा नष्ट हो जाता था, जिसको
सच्चा सुख स्वरूप कहा जा सकता। उस पर तो सब कुछ न्यौछावर करने योग्य साधन
आवश्यकता रूप ज्ञान का उपदेश था, जिस का त्याग रूप ही जीवनपर्यन्त सुखद
बना रहा सो सब कुछ सत्य स्वरूप अजर अमर परमात्मा स्वरुप ही त्याग साधन रूप था
सन्मुखता का ही सच्चा स्वरूप रूपी त्याग-स्वरूप माना गया जिस द्वारा सब कुछ संसार
त्याग पाया
इसलिए संसार त्याग केवल त्याग नाम से नहीं था, 'संसार का त्यागकरणा' मनमुख
की अज्ञानता त्याग का अभिमान उत्पन्न करता था! केवल मुण्डन करा, वस्त्र रँगवा
लिए, यह सब केवल दिखावा मात्र, या अज्ञान त्याग स्वरूप कहा? त्याग केवल सो
वासना-कामना का त्याग जो जीवात्मा को बन्धनमुक्त करता है?
सन्मुखता का सच्चा त्याग ज्ञान, जो सब रूप से त्याग रूप का स्वरूप माना सो
सच्चा त्याग ज्ञान महापुरुषों की शरण ग्रहण करने, से मानव रूप को समझ संसार त्याग
सहज स्वरूप रूप में समझा जा सकता जब मानव ज्ञान द्वारा संसार त्याग सच्चा रूप जान
संसार त्याग विचार द्वारा संसार त्याग सुखद स्वरूप रूप से जाना था, इसलिए सन्मुख
महापुरुषों द्वारा संसार का त्याग
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