एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)
by ओशो (आचार्य रजनीश)
Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)
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Read in contextविचारो का मथन्न् प्रारंभ होता ही था, किंतु दो तीन मिनट बीतने पर देखा, उसका चेहरा
भी ढीला
चेहरा ढीला, उसकी चोंच कुछ शिथिल सी गिर पड़ी नीचे, पंख संकुचित
होकर नीचे लटकने लग गये—; नीचे सिर, आँखें बंद, उसकी गर्दन ढीली पड़ कर जमीन
पर लेट गयी। उसका सिर ज़रा सा हिला और दम छूँ-छू गया री, बेबस; पल-भर पहले वह,
जिसने उड़ान का दम मारा— जिसने सारे वायुमंडल को नाप लिया—
केवल दो मिनट? यह विस्मित विचार मन में टकराकर खामोश हो गया। सारा
पर्यावरण आश्चर्यचकित स्तब्धता से भर उठा था। एक ओर दो-चार हंस इस प्रकार
चोंच नीचे गिराए खड़े रहे और दूसरी ओर कई जल-पक्षी भी मुंह-बंद से बैठे रहे।
केवल हवा में तरावट आयी, जिसके दो झोंके लहरों पर से होकर हमारे चेहरों तक पहुँचे—
मानों प्रश्न कर रहे हों— क्या? क्या मृत्यु सत्य है? क्या जीवन क्षणभंगुर है? क्या वह हंस
संसार छोड़ गया?
हमारी आँखों में पश्चाताप की भावना भर उठी। मैंने कहा—
पश्चाताप केवल इस बात का था, जिसे हमने सताया था, उसकी हम रक्षा न कर
सके। ऐसा लगा, उस हंस रूपी देवता की हम रक्षा न कर सके, जिन्होंने स्वयं
अपने प्राणों को त्याग कर हमें बचा लिया—; पर क्या बचा? उस दिन
हमारा जो कुछ नष्ट हुआ था वह अब कभी भी नहीं आ सकता था।
पर सब कुछ, सब कुछ नष्ट हो गया; वह सब कुछ जो उस चिड़िया के रूप
में हम पाए हुए थे।
तभी जो हंस, जिसके सिर पर सफेद सी लकीर थी वह आगे बढ़ा और एक
ही छलांग में पानी में कूद पड़ा। उसके कूदने से पानी में जो हलचल हुई वह
शांत हो गई लेकिन झील के मध्य--में जा कर वह हंस रुक गया। उसकी
गर्दन में कुछ मरोड़ सी पैदा हुई और वह जल-पंछी, जो हंसों का मुखिया
जान पड़ता था, आगे बढ़ा और पानी में तैरने लगा। बाकी हंस,
जो किनारे पर थे सब कुछ देख रहे थे लेकिन सभी अवाक खड़े थे।
उसने कहा, "जीवन का सत्य तो परमात्मा द्वारा प्रदान की अनूठी देन
को खो देना नहीं है।"
इसके बाद तो उस जलकुंभी से भरे सरोवर का सारा दृश्य ही बदल गया।
किनारे पर खड़े हंसों ने अपनी चोंच को पानी में डूबोया और पंखों को
फैलाकर तैरना प्रारंभ किया। पानी की धार में उतरने वाले पंछी भी सरोवर
की गहराइयों में तैर गए। इसके बाद वे सभी हंस, जो जल
क्रीड़ा
छू--छू पंछियों का चहकना मन को मोह रहा था। पक्षी तो उड़ रहे थे।
फिर हमें ऐसा क्यों लगा? पक्षी तो कभी बीमार नहीं पड़ते। मनुष्य
क्यों उस पंछी की भांति स्वयं को असहाय बना लेता है?
प्रकृति का ऐसा सुंदर रूप तो किसी की समझ में नहीं आता, फिर
मनुष्य क्यों भागता है? मनुष्य उस हंस जैसा क्यों नहीं बनता
जो अपनी मृत्यु को शांत भाव से स्वीकार करता है?
क्या मनुष्य को नहीं सोचना चाहिए?
मानव समाज का दुर्भाग्य है, मनुष्य उस बात को नहीं समझ सका।
जो समय के महत्व को समझ गया, वह सब कुछ पा गया।
...
वर्तमान में जो कुछ दिखाई देता है वह कल नहीं रहता।
जो समय को पहचान गया वह अपने जीवन में सफल हो गया,
समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। जो समय को महत्व नहीं देता
वह कभी भी अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाता।
वह जीवन में सदा ही पछताता रहता है।
इस बात को समझ कर ही हमें आगे बढ़ना चाहिए।
एक बार जो समय बीत गया, वह फिर वापस नहीं आता, अतः अपने
समय का सदुपयोग करना चाहिए।
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