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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)

by ओशो (आचार्य रजनीश)

Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)

DevanagariHindipublished322 pages

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इस प्रकार जब हम अनेक जातियों को अपने भीतर समाविष्ट कर लेते हैं तब हमारा राष्ट्र अधिक
समर्थ होता
पर बात तो यह थी कि यह तो ब्राह्मण द्वारा रचा गया खेल था। उसने स्वयं श्रेष्ठ बनने
के लिए जातियों बनाईं जो कि ऐसा कार्य था जो ईश्वर को भी रोष से भर दे। इसलिए उसने
उनके लिए एक ऐसे मसीहा को भेजा जो इस विषय पर अपने देश भाईयों को सही शिक्षा दे।
स्वामी जी हंस, पर निराशा से सिर हिला दिया। विवस्वान् ने उसे देखा, वे
शान्त थे।
विवस्वान् फिर बोले... ज्ञान के द्वारा ही तो हम सत्य तक पहुँच सकते हैं। क्या
ज्ञान ज्ञान में अंतर हो सकता है? ज्ञान एक दिव्य ज्योति है। यह केवल एक सम्प्रदाय अथवा
जाति तक ही सीमित नहीं रहता। प्रत्येक मानव आत्मा ज्ञान का पात्र बन सकती है। ज्ञान ईश्वर की
सबसे सुन्दर देन है। क्या ईश्वर? प्रकृति सब मनुष्यों? प्रकृति केवल किसी विशेष जाति को
ही ज्ञान देती है। ज्ञान का दीपक तो सब के लिए जलता है। क्या वायु सब के लिए नहीं बहती?
क्या सूर्य केवल?
अब तक उसने ब्राह्मण को केवल घमंडी और स्वार्थी रूप समझा था। ज्ञानवान्
विवस्वान् नम्र थे, विवस्वान् के मुख पर क्रोध का कोई चिह्न न था। विवस्वान् ने कहा
तो सब था, किन्तु उनके स्वर में कटुता नहीं थी। क्या ऐसा ब्राह्मण भी हो सकता है, जो
ब्राह्मणवाद विरोधी विवस्वान् ने आगे कहा
पर बात तो तब बनती जब मैं, या स्वामी जी या अन्य सम्प्रदाय वाले हम सब
वे विवस्वान् की-सी भव्य मूर्ति देखते रहे।
उसने हाथ जोड़ प्रणाम किया व केवल बोला
"ज्ञानियों की वाणी से अज्ञानियों मिटना चाहिये। ज्ञानियों को समझना होगा ज्ञान का दीपक
बुझेगा"
स्वामी जी आगे बढ़ गये। दिन-रात के संगम काल की इस संध्या वेला को
उन्होंने बहुत देखा था, किन्तु आज कुछ विशेष बात
"ज्ञानियों को तो केवल उस सर्वशक्तिमान की पूजा करनी चाहिये जो विश्व रक्षक है।"
उसने हाथ जोड़ प्रणाम किया व केवल बोला
उन्होंने देखा वह विह्वल होकर सिसक
पर यह सब, जो हो तो चुका था उस ओर दृष्टि न कर वह आगे की ओर देख रहा था
वे सन्यासी की ओर बढ़ रहे थे, पर बात तब भी बनती जब स्वामी जी यह मान लेते कि
ज्ञान सब मनुष्यों का, जब केवल ब्राह्मण का ही नहीं सब मानवों का अधिकार है। फिर क्यों
ना ज्ञान रूपी दीपक चारों ओर फैल कर, अंधकार को मार, उजाले से संसार को भर दे।
उसने भी, पर ज्ञान को अपने तक सीमित रखना ही तो सबसे बड़ा पाप है। ज्ञान रूपी
दीपक बुझे; तो केवल यही, कि सम्प्रदाय बने, ना ब्राह्मण बने, ना कोई शूद्र बने, ना
क्षत्रिय रहे।
उसने ब्राह्मण को केवल एक ही रूप में ही देखा था। क्या ब्राह्मण का कोई रूप
और भी हो सकता है, फिर ज्ञान सब मानवों तक कैसे पहुँचे? जो समाज अपने
को सर्वश्रेष्ठ समझ बैठा है वह तो ज्ञान का ही नाश कर रहा है। ज्ञान पर तो
सबका अधिकार होना चाहिये। विवस्वान् की बात पर सोचता हुआ, वह आगे बढ़
गया। वह सोच रहा
उसने कहा मेरा स्थान नहीं ब्राह्मण
उसने केवल प्रणाम... ।
"ज्ञान अन्तः-मन को ही पावन कर देता है।"
वह संध्या कालीन बेला थी जब वह आश्रम-द्वार पर पहुँचा था, जब उसने
ज्ञान रूपी ज्योति जला कर अपने जीवन को पावन बनाने का निश्चय किया था। स्वामी
जी शंख की ध्वनि बजा, संध्या की ओर उन्मुख हुये; अपनी ओर आते हुए उस
को देखकर रूक गये, क्या कोई नया भिक्षु? वह स्वामी और शिष्य के मध्य चुप-
चाप हो उस ओर बढ़ रहा था, पर, स्वामी जी की दृष्टि ने उसे बांध
दिया था। मन ही मन वह नतमस्तक हो गया। स्वामी जी ने देखा वह विह्वल होकर
रोया, उसने स्वामी से कहा, कि वह सब कुछ छोड़ ज्ञान की प्राप्ति के लिए
आया है। विवस्वान् ने कहा, ज्ञान का द्वार सबके लिए खुला
केवल मन निर्मल स्वच्छता की ओर होना चाहिये। स्वामी, जी क्या सन्यासियों
द्वारा ही इस मानव समाज भला हो सकता है। क्या घर रह कर मनुष्य ज्ञान की ओर
ध्यान दे सकता अथवा मन को एकाग्र कर क्या वह ईश्वर को पहचान
सकता है, ज्ञान क्या घर छोड़ना? ज्ञान तो मन का, ज्ञान तो मन की तृष्णा का ही
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