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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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Page 316

२९८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ०
सद्यः कालान्तरे च फलनिष्पत्तेः संशयः ॥ ४४ ॥
पचति, दोग्धीति सद्यः फलमोदनपयसी । कर्षति, वपतीति कालान्तरे फलं
शस्याधिगम इति । अस्ति चेयं क्रिया 'अग्निहोत्रं जुहुयात्स्वर्गकामः' इति, एतस्याः
फले संशयः१ ॥ ४४ ॥
न सद्यः; कालान्तरोपभोग्यत्वात्२ ॥ ४५ ॥
स्वर्गः फलं श्रूयते, तच्च भिन्नेऽस्मिन्देहे भेदादुत्पद्यते इति न सद्यः ग्रामादि-
कामानामारम्भफलमिति ॥ ४५ ॥
कालान्तरेणानिष्पत्तिर्हेतुविनाशात् ? ॥ ४६ ॥
ध्वस्तायां प्रवृत्तौ प्रवृत्तेः फलं न कारणमन्तरेणोत्पत्तुमर्हति, न खलु वै
विनष्टात् कारणात्किञ्चिदुत्पद्यते इति ॥ ४६ ॥
प्राङ् निष्पत्तेर्वृक्षफलवत् तत्स्यात् ॥ ४७ ॥
यथा फलार्थिना वृक्षमूले सेकादि परिकर्म क्रियते, तस्मिंश्च प्रध्वस्ते पृथिवी-
तत्काल तथा कालान्तर में फलनिष्पत्ति से संशय होता है ॥ ४४ ॥
'पकाता है' 'दुहता है' इन क्रियाओं के भोजन तथा दूध सद्यः फल हैं । 'जोतता है'
'बोता है' इन क्रियाओं का धान्यप्राप्तिरूप फल कालान्तर में मिलता है । एक यह भी
क्रिया है—'स्वर्गेच्छु पुरुष अग्निहोत्र करे', इस क्रिया में संशय होता है कि यह सद्यःफल-
प्रद है या कालान्तर में फलप्रद है ॥ ४४ ॥
स्वर्ग के कालान्तरोपभोग्य होने से उक्त क्रिया सद्यःफलप्रद नहीं है ॥ ४५ ॥
उस अग्निहोत्र क्रिया का आप्त पुरुषों द्वारा स्वर्गफल सुना जाता है । वह फल
इस शरीर के नष्ट होने पर दूसरे शरीर में बन सकता है, अतः यह क्रिया सद्यःफलप्रद
नहीं है, जैसे—ग्रामाद्युपार्जनरूप फल राजा की सेवा के तत्काल बाद इस शरीर में ही
मिल जाता है ॥ ४५ ॥
हेतु के विनष्ट हो जाने से कालान्तर में भी उक्त फलनिष्पत्ति नहीं होगी ? ॥४६॥
कर्मसमाप्ति के बाद कर्म के विनष्ट हो जाने पर तत्कार्यभूत फल कारण के विना
उत्पन्न नहीं हो सकता; क्योंकि कारण के विना कुछ भी नहीं हुआ करता ? ॥ ४६ ॥
वृक्षफल की तरह स्वर्गादिनिष्पत्ति से पूर्व वह क्रिया फल का साधन तो होगी
ही ॥ ४७ ॥
जैसे फल चाहनेवाला पुरुष वृक्ष की जड़ में जलसिञ्चन-आदि क्रिया करता
१. अत्रोद्यनाचार्येण भाष्याक्तावस्वरसः प्रदर्शित इति परिशुद्धौ द्रष्टव्यः ।
२. न्यायसूचीनिबन्धेष्वेतत्सूत्रमपीदं सूत्रं वार्त्तिकस्वारस्येन स्वीकृतम् ।