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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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Page 292

अथ चतुर्थोऽध्यायः
[ प्रथममाह्निकम् ]
प्रवृत्तिदोषसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् [ १-२ ]
मनसोऽनन्तरा प्रवृत्तिः परीक्षितव्या । तत्र खलु यावद्धर्माधर्माश्रयशरीरादि
परीक्षितम्, सर्वा सा प्रवृत्तेः परीक्षैत्याह—
प्रवृत्तिर्यथोक्ता¹ ॥ १ ॥
तथा परीक्षितेति ॥ १ ॥
प्रवृत्त्यनन्तरास्तर्हि दोषाः परीक्ष्यन्ताम् ? इत्यत आह—
तथा दोषाः ॥ २ ॥
परीक्षिता इति । बुद्धिसमानाश्रयत्वादात्मगुणाः प्रवृत्तिहेतुत्वात् पुनर्भव-
प्रतिसन्धानसामर्थ्याच्च संसारहेतवः, संसारस्यानादित्वादनादिना प्रबन्धेन
उद्देशसूत्र (१.१.९) में मन के बाद प्रवृत्ति का नाम गिनाया गया है, अतः मन
की परीक्षा के बाद 'प्रवृत्ति' की परीक्षा किया जाना आवश्यक है । परन्तु पीछे जो
धर्म, तथा अधर्म के आश्रयभूत शरीरादि की परीक्षा की गयीं, वे सब एक तरह से
'प्रवृत्ति' की ही परीक्षा हैं; क्योंकि प्रवृत्ति धर्माधर्मान्तःपाती है। अतः धर्माधर्म की
परीक्षा से उसकी भी परीक्षा हो ही गयी—इसी आशय को लेकर (सूत्रकार) कहते हैं
प्रवृत्ति (शरीरादि की परीक्षा) जैसे पीछे वर्णित की जा चुकी है ॥ १ ॥
उस वर्णन से ही उसका परीक्षा हो चुकी । ( पीछे हम जैसा उसका लक्षण कर
आये हैं, उस लक्षण के सहारे जो कुछ भी हम प्रसङ्ग-प्रसङ्ग पर उसके वारे में कह चुके
हैं, उसीसे इस ( प्रवृत्ति ) पर अच्छी तरह विचार किया जा चुका ) ॥ १ ॥
तो फिर प्रवृत्ति के बाद परिगणित दोषों की ही परीक्षा कर लें ? इस पर कहते हैं—
उसी तरह दोष भी ॥ २ ॥
परीक्षित हो चुके । दोषों के प्रवृत्तितुल्य होने से पूर्वपरीक्षा से दोषों की भी परीक्षा
हो चुकी । कहने का तात्पर्य यह है कि दोष बुद्धि के समानाश्रय हैं, यों वे भी आत्मगुण
होते हुए प्रवृत्ति के हेतु हैं, और पुनर्जन्म की प्रतिसन्धि कराने में सामर्थ्य रखते हैं,
अतः वे भी संसार के हेतु हैं, तथा संसार के अनादि होने से दोष भी अनादि सन्तानरूप
१. वार्त्तिककारास्तु सूत्रोक्तं यथाशब्दं द्वितीयसूत्रस्थेन 'तथा' शब्देन योजयन्ति ।
'प्रवृत्तिर्यथोक्ता' तथा दोषा अपि इति तस्य हृदयम् ।