न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन
Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context५८. सू० ] मनःपरीक्षाप्रकरणम् २६१
न; युगपदनेकक्रियोपलब्धेः ? ॥ ५७ ॥
अयं खल्वध्यापकोऽधीते, व्रजति, कमण्डलुं धारयति, पन्थानं पश्यति, शृणो-
त्यरण्यान् शब्दान्, बिभेति, व्याललिङ्गानि बुभुत्सते, स्मरति च गन्तव्यं स्थानी-
यमिति क्रमस्याग्रहणाद्युगपदेताः क्रिया इति प्राप्तं मनसो बहुत्वमिति ? ॥५७॥
अलातचक्रदर्शनवत् तदुपलब्धिराशुसञ्चारात् ॥ ५८ ॥
आशुसञ्चारादलातस्य भ्रमतो विद्यमानः क्रमो न गृह्यते, क्रमस्याग्रहणा-
दविच्छेदबुद्ध्या चक्रवद् बुद्धिर्भवतीति; तथा बुद्धीनां क्रियाणां चाशुवृत्तित्वाद्
विद्यमानः क्रमो न गृह्यते, क्रमस्याग्रहणाद् युगपद् क्रिया भवन्तीति अभिमानो
भवति ।
किं पुनः-क्रमस्याग्रहणाद् युगपद् क्रियाभिमानः ? अथ युगपद्भावादेव युग-
पदनेकक्रियोपलब्धिरिति ?—नात्र विशेषप्रतिपत्तेः कारणमुच्यते इति ? उक्तम्—
इन्द्रियान्तराणां विषयान्तरेषु पर्यायेण बुद्धयो भवन्तीति । तच्चाप्रत्याख्येयम्;
शङ्का—
एक साथ अनेक क्रियाएँ उपलब्ध होने के कारण आप ऐसा नहीं कह
सकते ? ॥ ५७ ॥
जैसे एक ही अध्यापक पढ़ता भी है, चलता भी है, कमण्डलु उठाता है, रास्ता
देखता है, जंगल में होने वाले शब्द सुनता है, उनसे डरता है, सांप के निशान को
देखना चाहता है, गन्तव्य स्थान का स्मरण करता है—यों इस अध्यापक की इन
क्रियाओं में क्रमिक ग्रहण न होने से ये क्रियाएँ एक साथ ही हुईं—ऐसा मानना पड़ेगा,
ऐसी स्थिति में मन में अनेकत्वप्रसङ्ग हुआ कि नहीं ? ॥ ५७ ॥
उत्तर—
अलातचक्र की तरह, उन क्रियाओं की युगपदुपलब्धि आशुसंचार से हो जाती है ॥५८॥
अति शीघ्र घूमने से घूमते हुए अलात (जलती लकड़ी) में विद्यमान क्रम जैसे ज्ञात
नहीं होता, क्रम के अग्रहण से वहाँ अविच्छिन्नत्व बुद्धि होने लगती है; उसी तरह बुद्धि
तथा क्रियाओं में अतिशैघ्य होने से उनमें विद्यमान क्रम ज्ञात नहीं हो पाता । क्रम के
अज्ञात रहने से वहाँ युगपत् क्रियाएँ हुईं—ऐसा भ्रम होता है । वस्तुतः ये क्रियायें
क्रमिक ही हैं ।
शङ्का—
यहाँ क्रम के अग्रहण से युगपत् क्रिया का भ्रम है ? या क्रियाओं के युगपद् होने से
वहाँ क्रियायौगपद्य गृहीत होता है ?—इनमें से हम किस बात को उचित समझें; किसी
पक्ष में कोई हेतु दीजिये ?
उत्तर—कहा तो कि विषयान्तर में इन्द्रियान्तरों का ज्ञान क्रमिक ही होता है, इसके
स्वसिद्ध (प्रत्यात्मवेदनीय) होने से । इस सिद्धान्त का आप खण्डन नहीं कर सकते । एक