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निराले सद्गुरु

निराले सद्गुरु

Nirale Satguru

by साहिब बन्दगी

Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)

DevanagariHindipublished112 pages

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निराले सद्गुरु \hfill 51

यानी उसे इतने सारे धार्मिक अगुआ लोगों में से आप ही में साहिब का नूर नज़र आया; आपमें ही उन्हें संत मत की झलक दिखाई दी; आपमें ही उन्हें साहिब की शिक्षा की सही तस्वीर दिखाई पड़ी। यदि गहराई में विचार किया जाए तो पता चलेगा कि यदि सद्गुरु उस परम-पुरुष का दर्पण हैं तो आप उस दर्पण के भी दर्पण हैं। आपमें ही एक सद्गुरु की झलक मिल सकती है; आप ही में एक सच्चे संत की झलक मिल सकती है।

देख तुम्हें लगता सबको,
है धरा पर उतर कबीर आया।
वो कबीर
जो
काया से दूर,
जिसका न कोई मात पिता,
आत्म में झलके
जिसका नूर,
अमर लोक का है जो स्वामी,
अपने हंसों की ख़ातिर
जो
ले अवतार युग-युग आया।
आज फिर,
अपने हंसों को लेने
उतर धरा पर कबीर आया॥

इसलिए शरीर धारण करना पड़ता है परम पुरुष को

सत्य पुरुष युग-युग इस संसार में जीवों के कल्याण के लिए आते हैं। एक समय आप बिना शरीर धारण किए ही गुप्त रूप से दुनिया को