निराले सद्गुरु
Nirale Satguru
by साहिब बन्दगी
Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)
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आदमी ही बूढ़ा होता है, अन्य कोई जीव नहीं। आदमी मतलबी है, साठ साल का होता है तो बच्चों को कहता है कि शर्म करो, मैंने आपको खिलाया, पढ़ाया, बड़ा किया; अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ, मुझे खिलाओ, मेरी सेवा करो। यह मतलब। कोई गाय का बछड़ा गाय के लिए कभी घास नहीं लाया कि ले माँ खा, अब तू बूढ़ी हो गयी है, मैं तेरी सेवा करता हूँ। कोई कौवे का बच्चा अपनी माँ को नहीं खिलाता। वे खुद करते हैं।
आपने फैसला किया कि कभी बूढ़ा नहीं होना है। सबका अपना-अपना लक्ष्य होता है। आपका लक्ष्य ही परमार्थ है, इसके लिए आपने दुनिया का मज़ा भी नहीं लिया।
दुनिया मतलब की क्यों है? किसी ने नहीं सोचा। किसी के पास माकूल जवाब नहीं है। क्योंकि दिमाग़ शातिर है, मतलब का है, हमेशा अपना सोचता है यह। दुनिया के लोग इसी के कहे अनुसार काम करते हैं। इसे बनाया ही इसलिए गया है कि अपने लिए ही सोचना है। आप अपने लिए नहीं सोचते हैं। प्रोग्राम देते-देते रात के 12-1 बज जाते हैं। 7-7 घण्टे का सफ़र करके दूर-दूर प्रोग्राम देने जाते हैं, फिर उसी समय प्रोग्राम देकर वापिस भी आते हैं। आपका दिमाग़ कभी हताश नहीं होता। क्योंकि आप स्वार्थी नहीं हैं। दुनिया का हरेक आदमी स्वार्थी है। आप इस दुनिया में दिखते हुए भी इसमें नहीं हैं, इसलिए आप स्वार्थी नहीं हैं।
अमर लोक के स्वामी साहिब, सेवक बनकर आए हैं।
ढूँढ़-2 कर दीन जनों को, प्रेम मलहम लगाए हैं॥
स्वामीपन का मान न कोई, हंसन दिल को भाए हैं।
मधुमय कर भक्तजनों को, अमर लोक पठाए हैं॥