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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

by महर्षि व्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished318 pages

Page 114 of 318

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Page 114

अध्याय ३१] ध्रुव-चरित्र तथा ग्रह, नक्षत्र एवं पातालका संक्षिप्त वर्णन १०३
त्रिगुणं परिणाहेन सूर्यबिम्बं प्रमाणतः।
सोमपुर्यां विभावर्यां मध्याह्ने चार्यमा यदा।
महेन्द्रस्यामरावत्यां तदा तिष्ठति भास्करः॥५०
मध्याह्ने त्वमरावत्यां यदा भवति भास्करः।
तदा संयमने याम्ये तत्रोद्यंस्तु प्रदृश्यते॥५१
मेरुं प्रदक्षिणं कुर्वन् भात्येव सविता सदा।
ध्रुवाधारस्तथोत्निष्ठन् बालखिल्यादिभिः स्तुतः॥५२
तथा उस ऊँचाईसे तीन गुने प्रमाणमें सूर्यमण्डलका दीर्घ
विस्तार है। जिस समय सूर्य चन्द्रमाकी विभावरीपुरीमें
दोपहरके समय रहते हैं, उस समय इन्द्रकी अमरावतीमें
उदय होते-से प्रतीत होते हैं। जिस समय अमरावतीपुरीमें
मध्याह्नके समय सूर्य रहते हैं, उस समय यमकी
संयमनी पुरीमें उदित होते दीख पड़ते हैं। भगवान्
सूर्य सदा मेरुगिरिकी परिक्रमा करते हुए ही सुशोभित
होते हैं। वे ध्रुवके आधारपर स्थित हैं। उनके उदय
होते समय बालखिल्यादि ऋषि उनकी स्तुति करते
हैं॥४९–५२॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे भूगोलकथने त्रिंशोऽध्यायः॥३०॥
इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें ‘भूगोलवर्णन’ विषयक तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥३०॥
इकतीसवाँ अध्याय
ध्रुव-चरित्र तथा ग्रह, नक्षत्र एवं पातालका संक्षिप्त वर्णन
भरद्वाज उवाच
कोऽसौ ध्रुवः कस्य सुतः सूर्याधारोऽभवत् कथम्।
विचिन्त्य कथयाशु त्वं सूत जीव समाः शतम्॥ १
सूत उवाच
मनोः स्वायम्भुवस्यासीदुत्तानचरणः सुतः।
तस्य क्षितिपतेर्विप्र द्वौ सुतौ सम्बभूवतुः॥ २
सुरुच्यामुत्तमो ज्येष्ठः सुनीत्यां तु ध्रुवोऽपरः।
मध्येसभं नरपतेरुपविष्टस्य चैकदा॥ ३
सुनीत्या राजसेवावै नियुक्तोऽलङ्कृतः सुतः।
ध्रुवो धात्रेयिकापुत्रैः समं विनयतत्परः॥ ४
स गत्वोत्तानचरणं क्षोणीशं प्रणनाम ह।
दृष्ट्वोत्तमं तदुत्सङ्गे निविष्टं जनकस्य वै॥ ५
प्राप्य सिंहासनस्थं च नृपतिं बालचापलात्।
आरुरुक्षुमवेक्ष्यामुं सुरुचिर्ध्रुवमब्रवीत्॥ ६
भरद्वाजजीने पूछा—सूतजी! ध्रुव कौन हैं? किसके
पुत्र हैं? तथा वे सूर्यके आधार कैसे हुए? ये सब बातें
भलीभाँति सोच-विचारकर बताइये। हमारी यह कामना
है कि आप हमें कथा सुनाते हुए सैकड़ों वर्षोंतक
जीवित रहें॥१॥
सूतजी बोले—विप्रवर! स्वायम्भुव मनुके एक
पुत्र थे राजा उत्तानपाद। उन भूपालके दो पुत्र हुए। एक
तो सुरुचिके गर्भसे उत्पन्न हुआ था, जिसका नाम उत्तम
था। वह ज्येष्ठ था और दूसरा पुत्र ‘ध्रुव’ था, जो
सुनीतिके गर्भसे उत्पन्न हुआ था। एक दिन जब राजा
राजसभामें बैठे हुए थे, सुनीतिने अपने पुत्र ध्रुवको
वस्त्राभूषणसे विभूषित करके राजाकी सेवाके लिये
भेजा। विनयशील ध्रुवने धायके पुत्रोंके साथ राजसभामें
जाकर राजा उत्तानपादको प्रणाम किया। वहाँ उत्तमको
पिताकी गोदमें बैठा देख ध्रुव सिंहासनपर आसीन
राजाके पास जा पहुँचा और बालोचित चपलताके
कारण राजाकी गोदमें चढ़नेकी इच्छा करने लगा। यह
देख सुरुचिने ध्रुवसे कहा॥२–६॥