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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished304 pages

About this granth

The Narada Smriti (नारद स्मृति) is the dharmashastra text devoted almost entirely to vyavahara, legal procedure and substantive law. Scholars usually place it around the middle of the first millennium CE. Unlike Manu or Yajnavalkya, it says little about conduct or penance and instead sets out the working of the court: plaintiff and defendant, witnesses, documents, and ordeals such as the balance. That focus makes it a key source for the history of Indian law.

Its sections follow the eighteen titles of law, among them recovery of debts, deposits, partnership, resumption of gifts, wages, sale, boundary disputes, relations between men and women, inheritance, violence, verbal and physical assault, and gambling. A verse index closes the book.

The opening pages of this scan belong to an edition in the Dynamic Religious Series bearing the name of Dr. Ram Kumar Verma "Shastri", with the Sanskrit verses and a Hindi translation. At about 304 pages, it is a useful text for students of dharmashastra and early Indian jurisprudence.

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उद्यान तथा निर्जन वन। इन स्थानों में परिचितों के मिलने की कम सम्भावना रहती
है।
स्मृतिकारों के अनुसार प्रेमी युगल (युवक-युवती) इन स्थानों को अपनी
प्रणयलीला के लिए सुरक्षित पाते हैं। इन स्थानों पर सशंक रूप से घूमते हुए युगलों
को घर से भागे तथा अनुचित चेष्टारत मानकर पकड़ लेना चाहिए।
दूतीप्रस्थापनैर्वापि लेखसम्प्रेषणैरपि।
अन्यैश्च विविधैर्दोषैर्ग्राह्यं संग्रहणं बुधैः ॥ 64 ॥
बुद्धिमानों को किसी युवक-युवती को एक-दूसरे के पास सन्देशवाहक को
भेजते अथवा उसके स्वागत पत्रों का आदान-प्रदान करते तथा इस प्रकार के
अन्यान्य गुप्त एवं दूषित चेष्टाएं देखकर दोनों की एक-दूसरे में अनुरक्ति-आसक्ति
समझकर उन्हें पकड़ लेना चाहिए।
स्त्रियं स्पृशेददेशे यः स्पृष्टो वा मर्षयेत्तथा।
परस्परस्यानुमतं सर्वं संग्रहणं स्मृतम् ॥ 65 ॥
पुरुष और स्त्री को एक-दूसरे के गुप्त अंगों को स्पर्श करते हुए अथवा एक-
दूसरे के द्वारा किये जा रहे स्पर्श का निवारण न करते हुए, अपितु उलटे प्रोत्साहन
(आंखें मटकाना, हंसना, मुख से सीटी बजाना, उछलना, गुदगुदाना, गीत गाना,
रोमाञ्चित होना तथा सीत्कारना आदि) देते हुए देखकर उन्हें परस्पर अनुरक्त मानते
हुए पकड़ा जा सकता है।
उपकारक्रिया केलिः स्पर्शो भूषणवाससाम्।
सहखट्वासनं चैव सर्वं संग्रहणं स्मृतम् ॥ 66 ॥
प्रसन्न भाव से एक-दूसरे को अंगवस्त्रों का आदान-प्रदान, एक-दूसरे से
हास-परिहास तथा उनकी प्रशंसा के बहाने एक-दूसरे के अंगों को छूना तथा दोनों
का एक ही आसन पर एक-दूसरे के साथ सटकर बैठना आदि एक-दूसरे के प्रति
आकर्षण एवं अनुराग वृद्धि के लक्षण हैं।
पाणौ यश्च निगृह्णीयाद्वेण्यां वस्त्राञ्चलेऽपि वा।
तिष्ठ तिष्ठेति वा ब्रूयात् सर्वं संग्रहणं स्मृतम् ॥ 67 ॥
युवक द्वारा युवती के वस्त्रों व उसकी वेणी आदि को अपने हाथों में हलके
से खींचना-झटकना और युवती द्वारा कृत्रिम क्रोध से मुसकराते हुए—ठहर, अभी
तुझे मज़ा चखाती हूं—कहना और उसके पीछे भागना आदि चेष्टाएं दोनों की
पारस्परिक अनुरक्ति के लक्षण हैं।
वस्त्रैराभरणैर्माल्यैः पानैर्भक्ष्यस्तथैव च।
सम्प्रेष्यमाणैर्गन्धैश्च वेद्यं संग्रहणं बुधैः ॥ 68 ॥
प्रेमी-प्रेमिका को एक-दूसरे के पास वस्त्रों, आभूषणों, पुष्पमालाओं, पेयपदार्थों,
नारदस्मृति / 211

दर्पाद्वा यदि वा मोहाच्छ्लाघया वा स्वयं वदेत्।

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उत्तम भक्ष्य पदार्थों तथा अन्यान्य उपहारों का आदान प्रदान करता देखकर, उन
दोनों की परस्पर अनुरक्ति का अनुमान लगाना चाहिए।
दर्पाद्वा यदि वा मोहाच्छ्लाघया वा स्वयं वदेत्।
ममेयं भुक्तपूर्वेति तच्च संग्रहणं स्मृतम्॥ ६९॥
किसी युवक प्रेमी द्वारा दर्प तथा मोहवश अथवा मिथ्या आत्म-विज्ञान की
इच्छा से प्रेरित होकर किसी युवती को अपनी 'भुक्ता' कहने का अर्थ, उसकी उसे
पाने की उत्कट अभिलाषा ही समझना चाहिए। युवती को अन्य उपायों से पाने में
असफल युवक कभी कभी उसे अपमानित-कलंकित करने से ही पाना सम्भव
मानकर ऐसी ओछी हरकतें करते हैं। वस्तुतः इसे युवक प्रेमी की कुण्ठा और
निराशा की परिणति ही समझना चाहिए; क्योंकि वह समझता है कि वश में नहीं
आती, तो मिथ्या आरोप लगाने में क्या बुराई है। वैसे, इस प्रकार के हताश प्रेमी को
ओछा व्यक्ति ही समझना चाहिए।
सजात्यतिशये पुंसां दण्ड उत्तमसाहसः।
मध्यमस्त्वानुलोम्येन प्रातिलोम्ये प्रमापणम्॥ ७०॥
समान वर्ण, जाति और स्थिति के व्यक्तियों द्वारा स्त्रियों पर मिथ्या आरोप
लगाकर, उन्हें वश में करने की चेष्टा करने पर युवक को उत्तम साहस का दण्ड
और उच्च वर्ण, जाति एवं स्थिति के पुरुष द्वारा अपने से निम्न जाति, वर्ण एवं स्थिति
की स्त्री को मिथ्या कलंकित करने पर मध्यम साहस का दण्ड देना चाहिए। निम्न
वर्ण जाति वाले युवक प्रेमी द्वारा अपने से उच्च वर्ण-जाति की युवती को अनुचित
रूप से अपमानित करने पर पुरुष को मृत्यु-दण्ड दिया जाना चाहिए।
कन्यायामस्कामायां द्वयाङ्गुलस्यावकर्तनम्।
उत्तमार्या वधस्त्वेव सर्वं संग्रहणं तथा॥ ७१॥
हीन अथवा समान वर्ण, जाति तथा स्थिति की कन्या की इच्छा के विरुद्ध
उसकी योनि को अंगुलि से अथवा लिंग से आहत करने वाले पुरुष के हाथ की दो
अंगुलियां काट डालनी चाहिए। अपने से उन्नत वर्ण-जाति की स्त्री से बलात्कार
करने वाले से न केवल उसकी सारी सम्पत्ति छीन लेनी चाहिए, अपितु उसे मृत्यु
दण्ड भी देना चाहिए।
सकामायां तु कन्यायां सङ्गमे नास्त्यतिक्रमः।
किन्त्वलंकृत्य सत्कृत्य स एवैनां समुद्वहेत्॥ ७२॥
कन्या की इच्छा एवं सहमति से उससे मैथुन करने वाला पुरुष दोषी नहीं
माना जाता। हां, पुरुष को अपने द्वारा भोगी गयी कन्या को समुचित आदर देते हुए,
उसे सजा-धजा कर उससे विवाह कर लेना चाहिए।
टिप्पणी—विवाह पूर्व प्रेमी से यौन सम्बन्ध रखने वाली कन्या को तो
212 / नारदस्मृति

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असंयत एवं उच्छृंखल ही कहा जायेगा। प्रेमान्ध व्यक्तियों की बात छोड़ दें, तो ऐसी
स्त्रियों को युवक प्रायः अपने विलास की सामग्री समझते हैं, उन्हें अपनी अर्धांगिनी
कदापि नहीं बनाते।
माता मातृष्वसा श्वश्रूर्मातुलानी पितृष्वसा।
पितृव्यसखिशिष्यस्त्री भगिनी तत्सखी स्नुषा ॥ 73 ॥
दुहिताऽऽचार्यभार्या च सगोत्रा शरणागता।
राज्ञी प्रव्रजिता धात्री साध्वी वर्णोत्तमा च या ॥ 74 ॥
असा मान्यतमां गत्वा गुरुतल्पग उच्यते।
शिश्नस्योत्कर्तनं तस्य नान्यो दण्डो विधीयते ॥ 75 ॥
निम्नोक्त बीस सम्बन्धियों से सम्भोग करने वाले युवक के लिंग को काट देना
ही इस पाप का एकमात्र दण्ड है, इसके अतिरिक्त दूसरा कोई दण्ड नहीं है—
सम्बन्धी स्त्रियां हैं—

  1. अपने पिता की पत्नी (माता तथा माता से भिन्न अन्य स्त्री, विमाता
    आदि), 2. माता की भगिनी (मौसी), 3. सासू मां, 4. मामी, 5. पिता की बहिन,
    बुआ, 6. चाचा की पत्नी या रखैल, 7. शिष्य की स्त्री, 8. बहिन, चाचा, मामा
    आदि की लड़की, 10. पुत्रवधू, 11. अपनी पुत्री, 12. आचार्य की पत्नी,
    13 अपने गोत्र—दूर के चाचा, भाई आदि की बहिन, पुत्री, बहू आदि, 14. शरण
    में आयी हुई असहाय स्त्री, 15. रानी, 16. संन्यासिनी, 17. दायी—पालन करने
    वाली अथवा स्तनपान कराने वाली स्त्री, 18. उत्तमर्ण की पतिव्रता स्त्री, 19. अपने
    वर्ण से भिन्न वर्ण जाति की स्त्री तथा 20. भाई की पत्नी।
    पशुयोनावतिक्रामन् विनेयः स दमं शतम्।
    मध्यमं साहसं गोषु तदेवान्त्यावसायिषु ॥ 76 ॥
    स्त्री पशुओं की योनि में लिंग-प्रवेश का दण्ड एक सौ पण है। गाय तथा
    चाण्डाल स्त्री से सम्भोग का मध्यम साहस दण्ड है।
    अगम्यागामिनश्चाति दण्डो राज्ञा प्रचोदितः।
    प्रायश्चित्तविधानं तु पापानां स्याद् विशोधनम् ॥ 77 ॥
    अगम्या—सम्भोग के लिए वर्जित—विमाता, गुरुपत्नी तथा शिष्या आदि—
    से मैथुन करने वाला, जहां राजा द्वारा दण्डित होता है, वहां उसे अपनी शुद्धि के
    लिए शास्त्रों में निर्दिष्ट प्रायश्चित्त भी करना होता है। इसके बिना वह जाति से
    बहिष्कृत माना जाता है।
    स्वैरिण्यब्राह्मणी वेश्या दासी निष्कासिनी च या।
    गम्याः स्युरानुलोम्येन स्त्रियो न प्रतिलोमतः ॥ 78 ॥
    अपने से निम्न अथवा अपने समान वर्ण की निम्नोक्त स्त्रियों से मैथुन करने
    नारदस्मृति / 213
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वाले को कोई दोष नहीं होता। ऐसी स्त्रियों के अपने से ऊपर के वर्ण से सम्बन्धित
होने पर उनसे सम्बन्ध योजना वर्जित होने से दण्डनीय अपराध है—

  1. स्वैरिणी—ब्राह्मणी से इतर वर्ण—क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, जाति की स्त्री।
  2. वेश्या—देह व्यापार से आजीविका चलाने वाली स्त्री।
  3. दासी—धन के व्यय से ख़रीदी गयी स्त्री तथा
  4. निष्कासिता—दुराचरण अथवा दुर्व्यवहार अथवा सम्बन्धों की विषमता
    के कारण घर से निकाली गयी महिला।
    आस्वेव तु भुजिष्यासु दोषः स्यात् परदारवत्।
    गम्या अपि हि नोपेया यत्ताः परपरिग्रहाः ॥ 79 ॥
    अपने वर्ण से ऊपर के वर्ण की स्त्रियों—स्वैरिणी, वेश्या, दासी तथा
    निष्कासिता—के भोग्या होने पर भी निम्न वर्ण वालों को इनसे सम्भोग नहीं करना
    चाहिए; क्योंकि मूलतः वे अपने पति की सम्पत्ति हैं। अतः उनका उपभोग परदारमगन
    जैसा दण्डनीय अपराध है।
    अनुत्पन्नप्रजायास्तु पतिः प्रेयाद् यदि स्त्रियाः ।
    नियुक्ता गुरुभिर्गच्छेद्देवरं पुत्र काम्यया ॥ 80 ॥
    सन्तान को उत्पन्न किये बिना मृत पति की विधवा केवल सन्तान-प्राप्ति के
    लिए, परिवार के वृद्धजनों की अनुमति से, अपने देवर से सम्बन्ध स्थापित कर
    सकती है।
    स च तां प्रतिपद्येत तथैव पुत्रजन्मतः।
    पुत्र जाते निवर्तेत संकरः स्यादतोऽन्यथा ॥ 81 ॥
    देवर को भाभी से गर्भधारणपर्यन्त ही देह-सम्बन्ध स्थापित करना चाहिए,
    अन्यथा उन दोनों के सम्बन्ध से उत्पन्न होने वाली सन्तान वर्णसंकर कहलायेगी।
    टिप्पणी—वर्णसंकर का अर्थ भिन्न-भिन्न वर्ण के पुरुष और स्त्री के
    समागम से उत्पन्न होने वाली सन्तान है। उदाहरणार्थ, ब्राह्मण के वीर्य तथा क्षत्रिया
    के गर्भ से अथवा क्षत्रिय के वीर्य तथा ब्राह्मणी के गर्भ से उत्पन्न सन्तान वर्णसंकर
    कहलायेगी। अतः यदि भाभी के गर्भवती हो जाने के उपरान्त भी देवर उसके साथ
    सम्भोग में प्रवृत्त रहता है, तो वह अधम आचरण करता है और उत्पन्न सन्तान न
    पिता की और न ही देवर की कहला सकती है। अतः सन्तान के भविष्य के लिए
    स्त्री (भाभी) को आत्मसंयम अपनाने की बात कही गयी है।
    घृतेनाभ्यज्य गात्राणि तैलेनाविकृतेन वा।
    मुखान्मुखं परिहरन् गात्रैर्गात्राण्यसंस्पृशन् ॥ 82 ॥
    भाभी से सम्भोग करने वाले देवर को सम्भोग से पूर्व अपने शरीर को घी
    तेल आदि से भली प्रकार चुपड़ लेना चाहिए। लिंग-प्रवेश-मैथुन आदि के समय
    214 / नारदस्मृति
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न तो उसे भाभी के शरीर को मसलना चाहिए और न ही दोनों को एक-दूसरे का
चुम्बन करना चाहिए। दोनों को मैथुन को यान्त्रिक क्रिया के रूप में ही ग्रहण करना
चाहिए।
टिप्पणी—इस सम्बन्ध में बोधायन सूत्रकार का कथन सर्वथा उपयुक्त ही
है- मुखचुम्बनगात्रमर्दनादिभिः पुनः पुनः सम्भोगाशा पुत्रजन्मान्तरमपि वर्धते,
तत्परिहाराय मुखचुम्बनादि निषिध्यते। इति मन्मतिः।
अर्थात् मुखचुम्बन तथा शरीर मर्दन से सम्भोग की इच्छा बढ़ती है, जिसे
पुत्रोत्पत्ति के उपरान्त भी रोक पाना सम्भव नहीं होता, मेरे विचार में इसी कारण से
कदाचित् इन क्रियाओं का निषेध किया गया है।
टिप्पणी- हमें तो यह समझ नहीं आता कि सम्भोग क्रिया में पुरुष द्वारा
स्त्री के अंगों—स्तन, जंघा तथा जघन आदि—को स्पर्श-आलिंगन तथा मुख-
चुम्बन आदि से बचना कैसे सम्भव है ? दो स्वस्थ युवक-युवती का एक बार
सम्भोग-सुख को भोगने पर उसे सहसा छोड़ पाना भी कैसे सम्भव है ? हमें तो
लगता है कि दोनों पुत्रोत्पत्ति को अपने मिलने में बाधक मानकर सन्तान-प्राप्ति के
प्रति प्रयत्नशील ही नहीं होंगे। यह तो एक निर्विवाद तथ्य है कि यौन-सुख का
परित्याग असम्भव नहीं, तो कठिन अवश्य है। स्त्री में मातृत्व की इच्छा अवश्य
होती है, परन्तु यौन-सुख-भोग की इच्छा उससे भी अधिक प्रबल होती है। जब
स्त्री को यह ज्ञात है कि उसके गुरुजन उसके गर्भधारण करते ही उसके नियुक्त
देवर से मिलने नहीं देंगे, तो वह गर्भधारण को बहुत समय तक टालती जायेगी।
इसके अतिरिक्त उनके गुप्त रूप से मिलने की सम्भावना को भी नकारा नहीं जा
सकता। इस प्रकार हम तो प्राचीनकाल में बहुप्रचलित नियोग प्रथा को सर्वथा
निर्दोष नहीं मानते। पुत्र-प्राप्ति को ही महत्त्वपूर्ण मानने का अर्थ स्त्री के व्यक्तित्व
को कुण्ठित करना तो नहीं होना चाहिए। उसे केवल पुत्र जनने की मशीन तो नहीं
बना देना चाहिए।
कुले तदवशेषे हि सन्तानार्थं न कामतः।
स्त्रियं पुत्रवतीं वन्ध्यां नीरजस्कामनिच्छतीम् ॥ 83 ॥
परिवार में उपयुक्त पुरुष के अभाव में गुरुजनों को किसी अन्य उपयुक्त
व्यक्ति— भले ही आयु में छोटा पुरुष, बड़ी आयु की स्त्री के लिए अथवा आयु में
बड़ा, छोटी आयु की स्त्री के लिए-को विधवा को पुत्रवती बनाने के लिए नियुक्त
करना चाहिए। जब तक स्त्री रजस्वला न हो, अपनी वंश-परम्परा को चलाने के
लिए देवर आदि किसी पर-पुरुष से मिलन को सहमत न हो तथा शारीरिक और
मानसिक रूप से स्वस्थ न हो, तब तक नियुक्त पुरुष को उसे मैथुन के लिए
निमन्त्रित नहीं करना चाहिए। कामवासना की तृप्ति के लिए सम्भोग में प्रवृत्त होने
वाले स्त्री पुरुष नरकगामी होते हैं।
नारदस्मृति / 215

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न गच्छेद् गर्भिणीं निन्दामनियुक्तां च बन्धुभिः ।
अनियुक्ता तु या नारी देवराज्जनयेत् सुतम् ॥ 84 ॥
जारजातमरिक्थीयं तमाहुर्ब्रह्मवादिनः ।
तथानियुक्तो यो भार्या यवीयाञ्ज्यायसो व्रजेत् ॥ 85 ॥
देवर आदि को गर्भवती, लोकनिन्दित तथा बन्धुओं द्वारा अननुमत (अनुमति
न दी गयी) अपनी भाभी से कदापि सम्भोग नहीं करना चाहिए। गुरुजनों द्वारा
अनियुक्त देवर से पुत्रोत्पन्न करने वाली स्त्री का पुत्र 'जारज'-अवाञ्छनीय व्यक्ति
के वीर्य से उत्पन्न-कहलाता है। उसे न तो पिण्डतर्पण आदि देने का और न ही
उत्तराधिकारी के रूप में पैतृक सम्पत्ति पाने का अधिकार मिलता है। ऐसा पुत्र भले
ही ज्येष्ठ द्वारा छोटी भाभी के उदर से अथवा कनिष्ठ भ्राता द्वारा बड़ी भाभी के उदर
से उत्पन्न हुआ हो, दोनों की समान स्थिति है, अर्थात् दोनों ग्राह्य नहीं होते। ऐसा
ब्रह्मवादियों का निश्चित मत है। नियोग से उत्पन्न पुत्र तभी ग्राह्य होता है, जब
परिवार के प्रामाणिक वृद्धजनों ने दोनों को इस मिलन की पूर्व अनुमति दे रखी
होती है, अन्यथा यह मिलन दुराचार एवं पाप ही कहलाता है और इस मिलन से
उत्पन्न सन्तान का भविष्य अन्धकारमय होता है।
यवीयसो वा यो ज्यायानुभौ तौ गुरुतल्पगौ।
नियुक्तौ गुरुभिर्गच्छेदनुशिष्ट्यात् स्त्रियं च सः ॥ 86 ॥
अग्रज तथा अनुज भ्राता द्वारा अपनी भाभी (छोटे भाई अथवा बड़े भाई की
पत्नी) के साथ सम्भोग गुरुपत्नी के साथ सम्भोग के समान जघन्य अपराध है।
सन्तान-प्राप्ति के लिए परिवार के वृद्धों द्वारा ज्येष्ठ अथवा कनिष्ठ भ्राता को नियुक्त
करना-भाभी के साथ समागम की अनुमति देना-तो मात्र एक आपातकालीन
व्यवस्था है, निस्सन्तान मृत पुरुष के पिण्डदान, तर्पण आदि के लिए उसके क्षेत्र में
उसके उत्तराधिकारी की व्यवस्था का प्रयास है। अतः इसे धार्मिक अनिवार्यता के
रूप में ही देखना चाहिए।
पूर्वोक्तेन विधानेन स्नुषां पुंसवने शुचिः ।
सकृदागर्भाधानाद्वा कृते गर्भे तथैव सा ॥ 87 ॥
अतः आप्त पुरुषों द्वारा नियुक्त ज्येष्ठ अथवा कनिष्ठ भ्राता को अपनी भाभी से
केवल एक बार अथवा गर्भधारणपर्यन्त ही सम्बन्ध रखना चाहिए। उसके उपरान्त
तो ज्येष्ठ भ्राता श्वसुर के समान और भ्रातृजाया बहू के समान होती है। इसी प्रकार
कनिष्ठ भ्राता पुत्र के समान और भाभी मां के समान होती है। दोनों-स्त्री और
पुरुष-को इसी धारणा को लेकर चलना चाहिए।
अतोऽन्यथा वर्तमानः पुमान् स्त्री वापि कामतः ।
विनेयौ सुभृशं राज्ञा विप्लवः स्यादतोऽन्यथा ॥ 88 ॥
216 / नारदस्मृति

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राजा को स्त्री की गर्भोत्पत्ति (पुत्र-प्राप्ति) के पश्चात् भी भाभी से प्रणय-
सम्बन्ध बनाये रखने वाले ज्येष्ठ अथवा कनिष्ठ भ्राता को मृत्युदण्ड देना चाहिए,
अन्यथा समाज में अराजकता फैल जायेगी, धर्म-मर्यादा विशृंखलित हो जायेगी
और मानव-चरित्र कलंकित हो जायेगा।
ईर्ष्यासूयसमुत्थे तु सम्बन्धे रागहेतुके।
दम्पती विवदीयातां न ज्ञातिषु न राजनि॥ 89 ॥
परिणय सूत्र में बंध जाने के उपरान्त पति-पत्नी को आपसी ईर्ष्या, द्वेष,
क्रोध अथवा राग आदि के कारण अपने जाति बन्धुओं तथा राज पुरुषों के सामने
एक दूसरे को अपमानित नहीं करना चाहिए। आशय यह है कि किसी कारणवश
दोनों को एक दूसरे के लिए उपयुक्त न समझने पर भी विवाह बन्धन को दैवी
विधान समझकर समझौते का मार्ग अपनाना चाहिए। एक दूसरे की न्यूनता के प्रति
सहानुभूति का दृष्टिकोण रखना चाहिए। इसी में गृहस्थ-जीवन की सफलता है।
अन्योन्यं त्यजतोरागः स्यादन्योन्यविरुद्धयोः ।
स्त्रीपुंसयोर्निगूढाया व्यभिचारादृते स्त्रियाः ॥ 90 ॥
विवाह के उपरान्त स्त्री-पुरुष के एक-दूसरे से सौमनस्य एवं सौहार्द न बन
पाने पर भी, दोनों को एक-दूसरे को सहन करने, दोषों की उपेक्षा करने तथा गुणों
को महत्त्व देने का अभ्यास करना चाहिए। यदि स्त्री व्यभिचारिणी अथवा स्वैरिणी
नहीं है, तो पुरुष को यत्नपूर्वक उसकी रक्षा करनी चाहिए। किसी साधारण दोष
अथवा अपराध अथवा मनमुटाव के कारण पुरुष को स्त्री को छोड़ने का अधिकार
नहीं मिल जाता। स्त्री के दुराचारिणी न होने पर, सम्बन्ध-विच्छेद करने पर भी,
दोनों को समान रूप से दोषी माना जाता है। समाज दोनो को अपमानित करता है
और उन्हें हीन दृष्टि से देखता है।
व्यभिचारे स्त्रियां मौण्ड्यमधः शयनमेव च।
कदनं वा कुवासश्च कर्म चावस्करोज्झनम् ॥ 91 ॥
व्यभिचारिणी स्त्री के सम्बन्ध बनाये रखने के आग्रह पर उसे सुधरने के
अवसर देने की अवधि में उसका सिर मुंडवा देना चाहिए, उसे रात्रि में धरती पर
सोना चाहिए। उसे पहनने के लिए गन्दे वस्त्र और खाने के लिए कुत्सित अन्न देना
चाहिए। इसके अतिरिक्त उससे मैला साफ़ करने जैसे निकृष्ट कार्य कराने चाहिए।
स्त्रीधनभ्रष्टसर्वस्वां गर्भविस्त्रंसिनी तथा।
भर्तुश्च वधमिच्छन्तीं स्त्रियं निर्वासयेत् पुरात् ॥ 92 ॥
स्त्रीधन तथा पुरुष की सम्पत्ति को उजाड़ने वाली, गर्भधारण न कर सकने
वाली अथवा बार बार ओषधि आदि खाकर जान-बूझकर गर्भपात करने वाली
तथा पति की हत्या की योजना (विष आदि देकर) बनाने वाली स्त्री को न केवल
नारदस्मृति / 217

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घर से, अपितु ग्राम नगर की सीमा से भी बाहर निकाल देना चाहिए।
अनर्थशीलां सततं तथैवाप्रियवादिनीम् ।
पूर्वाशिनीं च या भर्तुः क्षिप्रं निर्वासयेद् गृहात् ॥ 93 ॥
इसी प्रकार नित्य-प्रति कलह-क्लेश करने वाली, प्रतिदिन नये बखेड़े खड़े
करके पड़ोसियों के सामने परिवारजनों को अपमानित करने वाली, पति तथा
परिवारजनों को सदैव जली-कटी सुनाने वाली, अर्थात् कटुभाषिणी तथा पति के
भोजन करने से पूर्व ही भोजन कर लेने वाली स्त्री को घर से निकाल देना चाहिए।
वन्ध्यां स्त्रीजननीं निन्द्यां प्रतिकूलां च सर्वदा।
कामतो नाभिनन्देत कुर्वन्नेवं स दोषभाक् ॥ 94 ॥
वन्ध्या, लड़कियों को ही जनने वाली, समाज में कलंकित तथा पति का
अहित-चिन्तन करने वाली स्त्री की सहमति के बिना उससे सम्भोग करने वाला
पुरुष दण्डनीय अपराधी होता है।
अनुकूलामवाग्दुष्टां दक्षां साध्वीं प्रजावतीम् ।
त्यजन् भार्यामवस्थाप्यो राज्ञा दण्डेन भूयसा ॥ 95 ॥
राजा को निम्नोक्त गुणों से सम्पन्न स्त्री का त्याग करने वाले पुरुष को
यथोचित कठोर दण्ड देकर स्त्री को भार्या की मर्यादा पर पुनः स्थापित करना
चाहिए, अर्थात् पुरुष को अपनी पत्नी का सम्मान देने के लिए बाध्य करना
चाहिए। राज का यह कर्तव्य है कि वह पुरुष को साध्वी एवं निर्दोष स्त्री के साथ
अन्याय करने की छूट कदापि न दे तथा मनमानी करने पर पति कहलाने वाले पुरुष
को अनुशासन की शिक्षा दे-

  1. पति एवं परिवाजनों के सदैव अनुकूल रहने वाली, अर्थात् शालीनता से
    व्यवहार करने वाली।
  2. मधुर एवं शिष्ट भाषण करने वाली।
  3. गृहकार्यकुशल।
  4. साध्वी, अर्थात् पतिव्रता तथा
  5. पुत्रवती।
    अज्ञातदोषेणोढा या निर्दोषा नान्यमाश्रिता ।
    बन्धुभिः साभियोक्तव्या निर्बन्धः स्वयमाश्रयेत् ॥ 96 ॥
    विवाह से पूर्व पुरुष के किसी अज्ञात दोष का विवाह के उपरान्त पता चलने
    पर उस दोष को झेलने अथवा उससे समझौता करने को अप्रस्तुत स्त्री को दूसरे
    पुरुष का वरण करने के लिए उसके बन्धुओं के पास छोड़ देना चाहिए। बन्धुओं के
    अभाव में उस स्त्री को स्वयं अपने लिए किसी दूसरे पुरुष की खोज के लिए
    स्वतन्त्र कर देना चाहिए।
    218 / नारदस्मृति
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नष्टे मृते प्रव्रजिते क्लीवे च पतिते पतौ।
पञ्चस्वापत्सु नारीणां पतिरन्यो विधीयते॥ 97 ॥
निम्नोक्त पांच स्थितियों में स्त्री को वर्तमान पति का परित्याग तथा दूसरे पुरुष
के वरण का अधिकार है—

  1. पति का सन्तानोत्पादन में असमर्थ होना, अर्थात् उसके शुक्र में सन्तान
    उत्पन्न करने वाले कीटाणुओं का न होना।
  2. पति का असमय में परलोक सिधारना।
  3. पति द्वारा गृहत्याग कर विरक्त-संन्यासी बन जाना।
  4. पति का नपुंसक सिद्ध होना, अर्थात् उसका यौन भोग न कर पाना अथवा
    पत्नी को तृप्त-सन्तुष्ट न कर पाना तथा
  5. निन्दित कर्मों के कारण समाज द्वारा अपनी जाति से बहिष्कृत हो जाना।
    अष्टौ वर्षाण्युदीक्षेत ब्राह्मणी प्रोषितं पतिम्।
    अप्रसूता तु चत्वारि परतोऽन्यं समाश्रयेत्॥ 98 ॥
    क्षत्रिया षट् समास्तिष्ठेदप्रसूता समात्रयम्।
    वैश्या प्रसूता चत्वारि द्वे वर्षेत्वितरा वसेत्॥ 99 ॥
    पति के विदेश जाने पर उसकी कोई खोज-ख़बर न मिलने पर प्रसूता
    (सन्तानवती) ब्राह्मणी, क्षत्रिया और वैश्या स्त्री को क्रमशः आठ, छह और चार
    वर्षों तक उसके लौटने की, सुध-ख़बर देने की तथा निस्सन्तान ब्राह्मणी, क्षत्रिया
    और वैश्या को क्रमशः चार, तीन और दो वर्षों तक पति के लौटने की प्रतीक्षा करनी
    चाहिए। इस अवधि तक कुछ भी पता न चलने पर स्त्री दूसरा विवाह करने को
    स्वतन्त्र है।
    न शूद्रायाः स्मृतः काल एष प्रोषितयोषिताम्।
    जीवति श्रूयमाणे तु स्यादेष द्विगुणो विधिः॥ 100 ॥
    शूद्रा स्त्री के पति के विदेश जाने पर, उसके लौटने और प्रतीक्षा का कोई
    समय निर्धारित नहीं है। विदेश गये पति के जीवित होने का निश्चय होने पर वैश्या
    निर्धारित समय—निस्सन्तान वैश्या के लिए दो वर्ष तथा सन्तानवती वैश्या के लिए
    चार वर्ष—से दुगुने वर्ष, अर्थात् सन्तानवती शूद्रा को आठ वर्षों तक और सन्तानहीना
    को चार वर्षों तक अपने पति के लौटने की प्रतीक्षा करनी चाहिए।
    अप्रवृत्तौ तु भूतानां सृष्टिरेषा प्रजापतेः।
    अतोऽन्यगमने स्त्रीणामेष दोषो न विद्यते॥ 101
    सन्तान के न होने पर आधे समय तक विदेश गये पति की प्रतीक्षा करने के
    औचित्य का आधार—सन्तान के लिए ही विवाह का किया जाना—है। जब सन्तान
    ही नहीं है और विदेश गया पति अपने लौटने की खोज ख़बर ही नहीं देता, तो
    नारदस्मृति / 219
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फिर सम्बन्ध कैसा ? इसी आधार पर स्त्रियों को निर्धारित वर्षों तक प्रतीक्षा के
अनन्तर दूसरे पुरुष से सम्बन्ध जोड़ने में कोई दोष नहीं है।
आनुलोम्येन वर्णानां यज्जन्म स विधिः स्मृतः ।
प्रातिलोम्येन यज्जन्म स ज्ञेयो वर्णसंकरः ॥ 102 ॥
अनुलोम से उत्पन्न सन्तान, अर्थात् उच्च वर्ण के पुरुष द्वारा समान अथवा
निम्न वर्ण की स्त्री से उत्पादित, उदाहरणार्थ, ब्राह्मण के वीर्य से ब्राह्मणी, परन्तु
प्रतिलोम - निम्न वर्ण के पुरुष के वीर्य को धारण करने वाली उच्च वर्ण की स्त्री के
उदर से उत्पन्न - सन्तान वर्णसंकर (पतित) कहलाती है। उदाहरणार्थ, क्षत्रिय
पुरुष के वीर्य और ब्राह्मणी के उदर से उत्पन्न सन्तान अवैध कहलायेगी। अभिप्राय
यह है कि भिन्न वर्ण जाति के स्त्री-पुरुषों की सन्तान के सम्बन्ध में महत्त्व वीर्य
का है, क्षेत्र का नहीं।
अनन्तरः स्मृतः पुत्रः एवं एकान्तरस्तथा ।
द्वयन्तरश्चानुलोम्येन तथैव प्रतिलोमतः ॥ 103 ॥
अनुलोम क्रम से ब्राह्मण के वीर्य से चारों वर्णों की स्त्रियों के उदर से उत्पन्न
चारों पुत्र सवर्ण कहलाते हैं। इसी प्रकार क्षत्रिय के तीन, वैश्य के दो और शूद्र का
एक ही पुत्र सवर्ण होता है, इसी प्रकार प्रतिलोम क्रम से शूद्र के तीन पुत्र, वैश्य के
दो पुत्र व क्षत्रिय का एक पुत्र असवर्ण होता है।
अतः पारशवश्चैव निषादश्चानुलोमतः ।
अम्बष्ठो मागधश्चैव क्षत्ता च क्षत्रियात्मजः ॥ 104 ॥
अनुलोम क्रम से उच्च वर्ण (ब्राह्मण) द्वारा निम्न वर्ण की स्त्रियों - क्षत्रिया,
वैश्या तथा शूद्रा-से उत्पन्न किये गये पुत्र क्रमशः उग्र, पाराशव तथा निषाद
कहलाते हैं, अर्थात् ब्राह्मण द्वारा क्षत्रिया से उत्पन्न पुत्र 'उग्र' कहलाता है। ब्राह्मण
अथवा क्षत्रिय द्वारा वैश्या स्त्री से उत्पादित पुत्र 'पाराशव' कहलाता है तथा ब्राह्मण
अथवा क्षत्रिय अथवा वैश्य द्वारा शूद्रा स्त्री से जना पुत्र 'निषाद' कहलाता है।
इसी प्रकार प्रतिलोम क्रम से 'अम्बष्ठ,' 'मागध' और 'छत्ता' (क्षत्रियवर्ण)
कहलाते हैं, अर्थात् शूद्र के वीर्य और वैश्या अथवा क्षत्रिया अथवा ब्राह्मणी स्त्री के
उदर से उत्पन्न बालक 'अम्बष्ठ' कहलाता है, वैश्य के वीर्य और क्षत्रिया अथवा
ब्राह्मणी के गर्भ से उत्पन्न बालक 'मागध' कहलाता है तथा क्षत्रिय द्वारा ब्राह्मणी के
गर्भ से उत्पादित बालक 'छत्ता' कहलाता है।
आनुलोम्येन तत्रैका द्वौ ज्ञेयौ प्रतिलोमतः ।
क्षत्राद्याः प्रतिलोमाः स्युरनुलोमास्त्विमे स्मृताः ॥ 105 ॥
प्राचीन दो व्यवस्थाओं - 1 उच्च वर्ण की स्त्री, उच्च अथवा समान वर्ग के
अतिरिक्त किसी अन्य निम्न वर्ण की भोग्या बन ही नहीं सकती तथा 2. अपने से
220 / नारदस्मृति

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एक वर्ण नीचे की स्त्री से सम्बन्ध जोड़ना उचित होने—के आधार पर प्रत्येक वर्ण
के पुरुष का अनुलोम से एक-एक पुत्र उत्पन्न होगा और प्रतिलोम से दो-दो पुत्र
उत्पन्न होंगे। इस दृष्टि से छत्ता आदि को प्रतिलोम से उत्पन्न माना जायेगा। निम्न
वर्ण के पुरुषों द्वारा उच्च वर्ण की स्त्रियों से उत्पादित सन्तान 'अनुलोमज' कहलाती है।
ससंकरः श्वपाकाद्यास्तेषां त्रिःसप्त वै मताः ।
सवर्णो ब्राह्मणोपुत्रः क्षत्रियायामनन्तरः ॥ 106 ॥
संकर पुरुष के वीर्य और संकर स्त्री के उदर से जन्म लेने वाला बालक
‘श्वपाक' कहलाता है। इनकी तीन अथवा सात जातियां हैं। इसी प्रकार उग्र पुरुष
द्वारा क्षत्ता से जनित बालक ‘श्वपाक' तथा वैदेहक द्वारा अम्बष्ठा स्त्री से जनित
बालक 'सवर्ण' होता है, परन्तु ब्राह्मण द्वारा क्षत्रिया से जनित बालक को सवर्ण
बनाने के लिए उसका अभिषेक करना पड़ता है।
अम्बष्ठोग्रौ तथा पुत्रावेवं क्षत्रियवैश्ययोः।
एकान्तरस्तु चाम्बष्ठो वैश्यायां ब्राह्मणात् सुतः ॥ 107 ॥
इसी प्रकार क्षत्रिय के वीर्य और वैश्या स्त्री के गर्भ से उत्पन्न बालक
‘अम्बष्ठ' और वैश्य के वीर्य और शूद्रा स्त्री के गर्भ से उत्पन्न बालक 'उग्र'
कहलाता है।
टिप्पणी—मनु आदि अन्य स्मृतिकारों का मत नारद से कुछ भिन्न है।
उनके अनुसार—अनुलोम से, अर्थात् क्षत्रिय द्वारा वैश्या से उत्पन्न पुत्र 'अम्बष्ठ',
वैश्य द्वारा क्षत्रिया से उत्पन्न 'मागध' और शूद्र के वीर्य और क्षत्रिया के उदर से
उत्पन्न 'क्षत्रा' अथवा 'क्षत्ता' कहलाते हैं।
अम्बष्ठः आनुलोम्येन क्षत्रियस्य वैश्यायां जातः। मागधो वैश्यात् क्षत्रियायां
जातः। क्षत्ता शूद्रात् क्षत्रियायां जातः ।
शूद्रायां क्षत्रियात्तद्वन्निषादो नाम जायते ।
शूद्रा पारशवं सूते ब्राह्मणाद्व्यन्तरं सुतम् ॥ 108 ॥
क्षत्रिय द्वारा शूद्रा स्त्री से प्राप्त बालक 'निषाद' तथा ब्राह्मण द्वारा शूद्रा स्त्री से
प्राप्त बालक 'पारशव' कहलाता है। शूद्रा के दोनों पुत्रों में भी यही अन्तर है, अर्थात्
शूद्रा ने ब्राह्मण के वीर्य से गर्भधारण किया है, तो उत्पन्न पुत्र 'पारशव' कहलायेगा
और यदि उसने क्षत्रिय के वीर्य से गर्भ धारण किया है, तो उत्पन्न होने वाला
बालक 'निषाद' कहलायेगा।
आनुलोम्येन वर्णानां पुत्रा होते प्रकीर्तिताः ।
सूतश्च मागधश्चैव सुतावायोगवस्तथा ॥ 109 ॥
इसी प्रकार अनुलोम सम्बन्ध, अर्थात् उच्च वर्ण के पुरुष के वीर्य से और निम्न
वर्ण की स्त्री के उदर से जन्म लेने वाले 'सूत,' 'मागध' तथा 'अयोगव' आदि
कहलाते हैं।
नारदस्मृति / 221

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प्रतिलोम्येन वर्णानां क्षत्तृवैदेहकावपि।
अनन्तरः स्मृतः सूतो ब्राह्मण्यां क्षत्रियात् सुतः ॥ 110 ॥
इसी सन्दर्भ में प्रतिलोम सम्बन्ध—निम्न वर्ण के पुरुष द्वारा उच्च वर्ण की स्त्री
के उदर से उत्पन्न—बालक 'क्षत्ता' और 'वैदेह' कहलाते हैं। क्षत्रिय द्वारा ब्राह्मणी
के उदर से प्राप्त बालक 'अनन्तर' कहलाता है।
मागधायोगवौ तद्वद् द्वौ पुत्रौ वैश्यशूद्रयोः ।
ब्राह्मण्यान्तरं वैश्यात् सूते वैदेहकं सुतम् ॥ 111 ॥
वैश्य द्वारा क्षत्रिया से उत्पन्न बालक 'मागध' और शूद्र द्वारा वैश्या से उत्पन्न
बालक 'आयोगव' कहलाता है। वैश्य द्वारा ब्राह्मणी से उत्पन्न बालक 'एकान्तर'
होता है, उसका दूसरा नाम 'वैदेहक' भी है।
क्षत्तारं क्षत्रिया शूद्रात् पुत्रमेकान्तरं तथा।
द्वयन्तरः प्रातिलोम्येन पापिष्ठः संकरे सति ॥ 112 ॥
शूद्र के वीर्य को धारण करने वाली क्षत्रिया 'क्षत्ता' नामक एकान्तर पुत्र को
जनती है। प्रतिलोम्य में संकर होने पर, अर्थात् उस क्षत्ता द्वारा उच्च वर्ण की स्त्री को
गर्भवती बनाने पर उत्पन्न बालक 'पापिष्ठ' कहलाता है।
चाण्डालो जायते शूद्राद् ब्राह्मणी यत्र मुह्यति।
तस्माद्राज्ञा विशेषेण स्त्रियो रक्ष्यास्तु संकरात् ॥ 113 ॥
अपनी मर्यादा की रक्षा न करने वाली, अर्थात् शूद्र से सम्भोग कराने वाली
ब्राह्मणी 'चाण्डाल' को जन्म देती है।
इस प्रकार उच्च वर्ण के पुरुषों और निम्न वर्ण की स्त्रियों अथवा निम्न वर्ण के
पुरुषों और उच्च वर्ण की स्त्रियों के समागम से वर्णसंकर सन्तान उत्पन्न होती है,
जो सामाजिक विकास के मार्ग में बाधक सिद्ध होती है। अतः राजा को इस प्रकार
के सम्बन्धों को निरुत्साहित करने का वातावरण तैयार करना चाहिए।
॥ चतुर्थ अध्याय का द्वादश प्रकरण समाप्त ॥
222 / नारदस्मृति

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  1. दाय-भाग
    विभागोऽर्थस्य पित्र्यस्य पुत्रैर्यत्र प्रकल्प्यते।
    दायभाग इति प्रोक्तं तद्विवादपदं बुधैः॥ 1॥
    पुत्रों द्वारा पैतृक-सम्पत्ति का विभाजन 'दाय-भाग' कहलाता है। विद्वानों ने
    इसे विवादास्पद व्यवहार माना है।
    टिप्पणी— याज्ञवल्क्यस्मृति की मिताक्षरा टीकाकार के अनुसार— धन के
    मूल स्वामी के साथ रक्त सम्बन्ध के कारण स्वामी के धन पर सम्बन्धी के अधिकार
    के हो जाने का नाम 'दाय' है। इसके दो रूप-भेद हैं—अप्रतिबन्ध तथा सप्रतिबन्ध।
    दादा का पोते को तथा पिता का पुत्र को मिलने वाला धन अप्रतिबन्ध दाय है। इसके
    विपरीत चाचा तथा भाई आदि के पुत्र के रूप में, भावी स्वामी के न होने पर, दूसरों
    को मिलने वाला धन सप्रतिबन्ध है। विभाग का अर्थ है— अनेक स्वामियों का एक
    साथ बैठकर निर्धारित नियमों के आधार पर पैतृक धन की व्यवस्था का निर्णय लेना—
    "तत्र दायशब्देन यद्धनं स्वामिसम्बन्धादेव निमित्तादन्यस्य स्वं भवति
    तदुच्यते। स च द्विविधः अप्रतिबन्धः सप्रतिबन्धश्च। तत्र पुत्राणां पौत्राणां च
    पुत्रत्वेन पौत्रत्वेन च पितृधनं पितामहधनं च स्वं भवतीत्यप्रतिबन्धो दायः।
    पितृव्यभ्रातादीनां च पुत्राभावे स्वाम्यभावे च स्वं भवतीति सप्रतिबन्धो दायः।
    विभागो नाम द्रव्यसमुदाय विषयाणामनेकस्वाम्यानां तदेकदेशेषु व्यवस्थापनम्।"
    यह विभाजन कब व कैसे करना चाहिए—यह विवाद का विषय है। सामान्यतः
    मूल स्वामी के मर जाने पर, संन्यास ग्रहण कर लेने पर अथवा स्वामित्व का
    परित्याग किये जाने पर विभाजन का प्रश्न उत्पन्न होता है। इसी आधार पर दाय
    शब्द को इस प्रकार परिभाषित किया गया है—स्वामी के उपरत होने पर, उसके
    द्रव्य का दूसरे के अधिकार में चले जाने का नाम दाय है—"स्वाम्युपरमे यत्र द्रव्ये
    स्वत्वं तत्र निरूढो दाय शब्दः।"
    पितर्यूर्ध्वं गते पुत्रा विभजेरन्धनं क्रमात्।
    मातुर्दुहितरोऽभावे दुहितॄणां तदन्वयः ॥ 2 ॥
    पिता के परलोक सिधारने पर पुत्रों को क्रमानुसार बांटकर लेना चाहिए।
    नारदस्मृति / 223
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माता के दिवंगत होने पर, उसके स्त्रीधन पर उसकी लड़कियों का और लड़कियों
के न होने पर धेवतों-लड़कियों की सन्तान-का अधिकार होता है।
टिप्पणी- यहां 'क्रमात्,' अर्थात् क्रमानुसार शब्द एक विशेष प्रयोजन लिये
हुए है। स्मृतिकारों ने औरस, क्षेत्रज आदि बारह प्रकार के पुत्र माने हैं, जिसका
अर्थ, पैतृक सम्पत्ति पर सर्वप्रथम अधिकार औरस का, उसके पश्चात् क्षेत्रज का
और उसके पश्चात् अन्यान्यों का है, अर्थात् यहां क्रमशः चलना है। हां, दिवंगत
पुरुष के इन बारह प्रकार के पुत्रों में, किसी एक के भी न होने पर, उसकी सम्पत्ति
पर अन्यान्य सपिण्डी, सगोत्री आदि को अधिकार मिलता है, अन्यथा कदापि नहीं।
मातुर्निवृत्ते रजसि दत्तासु भगिनीषु च।
निवृत्ते वापि रमणे पितुर्युपरतस्पृहे ॥३॥
निम्नोक्त परिस्थितियों में पिता के जीवनकाल में उसकी इच्छा से (किसी
दबाव में आकर किया अथवा कराया गया विभाजन अवैध हो जाता है।) पुत्र
विभाजन कर सकते हैं-
1 माता की रजोनिवृत्ति हो जाना, अर्थात् अन्य सन्तान के उत्पन्न होने की
किसी सम्भावना का समाप्त हो जाना।
2. सभी बहिनों (भाइयों का भी) का विवाहित हो जाना।
3. पिता का अपनी पत्नी के साथ सम्भोग से उपरत हो जाना तथा
4. पिता द्वारा किसी अन्य स्त्री की स्पृहा न करना, अर्थात् पुनर्विवाह करने
की अथवा रखैल बनाने की इच्छा का न होना।
इन परिस्थितियों में पुत्रों के द्वारा किसी आवश्यकता को देखते हुए पिता के
जीवनकाल में, उसकी प्रसन्नता से, उसकी सम्पत्ति का विभाजन किया जा सकता
है।
पितैव वा स्वयं पुत्रान्विभजेद्वयसि स्थितः।
ज्येष्ठं वा श्रेष्ठभागेन यथा वास्य मतिर्भवेत् ॥४॥
पुत्रों की किसी मांग, अनुरोध आदि के न होने पर पिता अपने जीवनकाल में
अपनी इच्छा से अपनी सम्पत्ति का विभाजन करने को स्वतन्त्र है। वह चाहे, तो
बड़े बेटे को कुछ अधिक भाग दे सकता है। सत्य तो यह है कि वह अपने पुत्रों को
अपनी इच्छानुसार न्यूनाधिक देने को पूर्ण स्वतन्त्र है।
विभृयाद्वेच्छतः सर्वान् ज्येष्ठो भ्राता यथा पिता।
भ्राता शक्तः कनिष्ठो वा शक्त्यपेक्षाः कुले श्रियः ॥५॥
पिता के परलोक सिधारने पर पैतृक सम्पत्ति का भाइयों में विभाजन अनिवार्य
नहीं है। ज्येष्ठ भ्राता भी पिता के समान परिवार का मुखिया बनकर, परिवार के
सभी सदस्यों के भरण पोषण का दायित्व संभाल सकता है। ज्येष्ठ भ्राता के स्थान
224 / नारदस्मृति

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पर इस दायित्व को छोटा भाई भी ले सकता है; क्योंकि दायित्व का निर्वहण आयु
की अपेक्षा सामर्थ्य पर निर्भर है। समर्थ व्यक्ति ही परिवार में सुख-समृद्धि ला
सकता है। अतः कोई भी समर्थ भाई—ज्येष्ठ, मध्यम अथवा कनिष्ठ—परिवार को
संयुक्त बनाये रख सकता है। सभी भाइयों के साथ रहने को सहमत होने पर तथा
एक-दूसरे से सन्तुष्ट होने पर विभाजन की कोई आवश्यकता ही नहीं रहती।
शौर्यभार्याधने चोभे यच्च विद्याधनं भवेत्।
त्रीण्येतान्यविभाज्यानि प्रसादी यश्च पैतृकः ॥ 6 ॥
निम्नोक्त चार प्रकार के धन अविभाज्य हैं—एक भाई से दूसरे भाई इस प्रकार
के धन के विभाजन की मांग नहीं कर सकते—

  1. शौर्य से अर्जित धन—मल्लयुद्ध, धनुर्विद्या अथवा अन्य किसी प्रकार
    के साहसपूर्ण कार्य से पुरस्कार, पारितोषिक, उपहार तथा वृत्ति आदि के रूप में
    प्राप्त धन।
    आजकल की भाषा में क्रिकेट, हॉकी तथा चैस (शतरंज) आदि खेलों में
    विशिष्टता दिखाने पर मिलने वाला विदेशी धन तथा अर्जुन पुरस्कार आदि के साथ
    जुड़ा धन।
  2. भार्याधन—स्त्री द्वारा अपने मायके से लायी गयी चल-अचल सम्पत्ति
    तथा उसके द्वारा निजी व्यापार अथवा नौकरी आदि से अर्जित धन।
    मनु, याज्ञवल्क्य आदि के स्मृति-ग्रन्थों में निम्नोक्त छह प्रकार के धन को
    स्त्रीधन कहा गया है—
    (i) विवाह में दहेज के रूप में माता पिता से प्राप्त धन।
    (ii) विवाह के उपरान्त विदाई के समय स्त्री के जाति-बन्धुओं द्वारा उसे
    दिया गया धन।
    (iii) विवाह के उपरान्त घर आने पर वर के परिवारजनों द्वारा अपनी नववधू
    को अपनी प्रसन्नता से दिया गया धन।
    (iv) माता-पिता, भाइयों और जाति बन्धुओं से प्राप्त होने वाला धन।
    (v) विवाह के उपरान्त समय समय पर प्रसन्न हुए पति से प्राप्त धन तथा
    (vi) विवाह के उपरान्त स्त्री के भाई, बहिन आदि के विवाह, गृहप्रवेश आदि
    विशिष्ट मांगलिक अवसरों पर माता-पिता द्वारा गुप्त अथवा प्रकट रूप में दिया गया
    धन।
  3. विद्या-धन.—विद्या-प्राप्ति के उपरान्त सेवा-कार्य, पुस्तक लेखन अथवा
    निजी व्यवसाय—प्राइवेट प्रैक्टिस, डॉक्टर, वकील, चार्टर्ड एकाउण्टेण्ट, ज्योतिषी
    तथा आर्किटेक्ट आदि से प्राप्त धन तथा
  4. पिता द्वारा अपनी प्रसन्नता से अपनी सम्पत्ति में से दिया गया भाग।
    नारदस्मृति / 225
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मात्रा च स्वधनं दत्तं यस्मै स्यात् प्रीतिपूर्वकम्।
तस्याप्येष विधिर्दृष्टो मातापि हि यथा पिता॥ 7 ॥
उपर्युक्त चार प्रकार के धन के समान स्त्रीधन के रूप में प्राप्त एवं सुरक्षित
अपनी सम्पत्ति को माता अपनी प्रसन्नता से अपने किसी भी बेटे को सौंपने को
स्वतन्त्र है। दूसरे भाई माता द्वारा प्रदत्त उस धन के विभाजन की मांग भी नहीं कर
सकते; क्योंकि पिता के समान ही माता को भी अपनी सम्पत्ति के उत्तराधिकारी को
चुनने का पूर्ण अधिकार है।
मध्यग्न्यध्यावहनिकं भर्तृदायस्तथैव च।
भ्रातृमातृपितृप्राप्तं षड्विधं स्त्रीधनं स्मृतम्॥ 8 ॥
देवर्षि नारद ने निम्नोक्त छह प्रकार का स्त्रीधन अविभाज्य बताया है—

  1. विवाह-वेदी पर संकल्पपूर्वक माता-पिता द्वारा प्रदत्त।
  2. ससुराल में आने पर नव-वधू को प्राप्त धन।
  3. अपने पति से प्राप्त धन तथा
    4-6. भ्राता, माता और पिता द्वारा प्राप्त धन।
    स्त्रीधनं तदपत्यानां भर्तृगाम्यप्रजासु तु।
    ब्राह्मादिषु चतुष्ष्वाहुः पितृगामीतरेषु च॥ 9 ॥
    स्त्रीधन पर सर्वप्रथम उसकी सन्तान का अधिकार है। सन्तान के अभाव में
    चार प्रकार—ब्राह्म, प्राजापत्य, आर्ष और दैव—के विवाहों में से किसी एक के
    होने पर निस्सन्तान स्त्री के स्त्रीधन पर उसके पति का अधिकार है। सन्तान के न
    होने पर तथा विवाह के भी उपर्युक्त चार प्रकारों में से किसी एक के न होने पर
    स्त्रीधन पर उसके मायके वालों का अधिकार होता है।
    कुटुम्बं विभृयाद् भ्रातुर्यो विद्यामधिगच्छतः।
    भागं विद्याधनात्तस्मात् स लभेताश्रुतोऽपि सन्॥ 10 ॥
    यदि किसी भाई ने पैतृक धन की सहायता के बिना अपनी प्रतिभा और
    योग्यता से धन अर्जित किया है और संयोग से उसका भाई अविद्वान् रह गया है, तो
    विद्वान् भाई अपने अविद्वान् भाई को अपने विद्या से अर्जित सम्पत्ति में से कुछ देने
    अथवा न देने को पूर्ण स्वतन्त्र है।
    वैद्योऽवैद्याय नाकामो दद्यादंशं स्वतो धनात्।
    पित्र्यं द्रव्यं समाश्रित्य न चेत्तेन तदाहृतम्॥ 11 ॥
    इसके विपरीत यदि विद्या-प्राप्ति के लिए गये भाई के परिवार का भरण
    पोषण अथवा विद्या प्राप्ति-काल में अपने भाई के भरण पोषण का दायित्व निभाने
    वाले भाई के अविद्वान् रह जाने पर भी विद्वान् भाई द्वारा विद्या से अर्जित धन में
    भाग पाने का उसे अधिकार है।
    226 / नारदस्मृति
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द्वावंशौ प्रतिपद्येत विभजन्नात्मनः पिता।
समांशभागिनी माता पुत्राणां स्यान्मृते पतौ॥ 12॥
अपने जीवनकाल में, अपनी सम्पत्ति का, अपने पुत्रों में विभाजन करने वाला
अपने लिए दो भाग सुरक्षित रख सकता है। पति की मृत्यु के उपरान्त स्त्री को पति
की सम्पत्ति में से पुत्रों के बराबर एक भाग मिलता है।
ज्येष्ठायांशोऽधिको देयः कनिष्ठायावरः स्मृतः।
समांशभाजः शेषाः स्युरदत्ता भगिनी तथा॥ 13॥
विभाजन की एक व्यवस्था यह भी है कि ज्येष्ठ भाई को ज्येष्ठ भाग, मध्यम
भाई को मध्यम भाग तथा शेष भाइयों को समान भाग दिया जाता है। इस प्रकार के
विभाजन में अविवाहित भगिनी का विवाह सम्पन्न करने के लिए एक भाग अलग
रख दिया जाता है।
क्षेत्रजेष्वपि पुत्रेषु तद्वज्जातेषु धर्मतः।
वर्णावरेष्वंशहानिरूढाजातेष्वनुक्रमात् ॥ 14॥
धर्मपूर्वक विभिन्न वर्णों की एकाधिक स्त्रियों से क्षेत्रज आदि पुत्रों के होने
पर वर्णों की ऊंच-नीच के अनुसार अंश-हानि होती है। उदाहरणार्थ, एक ब्राह्मण
चारों वर्णों की चार स्त्रियों से धर्मपूर्वक विवाह कर सकता है और चारों से एक-
एक पुत्र है, तो इस स्थिति में पुरुष को अपनी सम्पत्ति के दस भाग करके चार भाग
ब्राह्मणी के पुत्र को, तीन भाग क्षत्रिया के पुत्र को, दो भाग वैश्या के पुत्र को और
एक भाग शूद्रा के पुत्र को देना चाहिए।
इसके अतिरिक्त एक ही वर्ण की एकाधिक स्त्रियों के होने पर और सभी
स्त्रियों के पुत्रवती होने पर सम्पत्ति का विभाजन विवाह क्रम से करना चाहिए।
उदाहरणार्थ, एक राजपुरुष ने तीन क्षत्रिया स्त्रियों से विवाह किया है और तीनों के
दो-दो पुत्र हैं, तो उसे अपनी सम्पत्ति के नौ भाग करके सर्वप्रथम विवाहिता को
चार भाग, दूसरे स्थान पर विवाहिता को तीन भाग और सबसे अन्त में विवाहिता
को दो भाग देने चाहिए। अब उन स्त्रियों के पुत्रों को आपस में उस धन के बराबर
भाग लेने का अधिकार है। इस प्रकार बहुविवाह की स्थिति में विभाजन का एक
आधार वर्ण है और दूसरा आधार वरीयता है।
पित्रैव तु विभक्ता ये हीनाधिकसमैर्धनैः।
तेषां स एव धर्मः स्यात् सर्वस्य हि पिता प्रभुः॥ 15॥
पुत्रों को अपने पिता द्वारा प्रदत्त अधिक अथवा न्यून अथवा समान धन को
अन्तिम रूप से मान्य करके ग्रहण करना चाहिए। उस पर आपत्ति अथवा आक्षेप
नहीं करना चाहिए; क्योंकि पिता को यह सब करने का पूरा-पूरा अधिकार है।
व्याधितः कुपितश्चैव विषयासक्तमानसः।
अन्यथाशास्त्रकारी च न विभागे पिता प्रभुः॥ 16॥
नारदस्मृति / 227

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निम्नोक्त विकारों से ग्रस्त पिता द्वारा अपनी सम्पत्ति का किया गया विभाजन
अन्तिम एवं मान्य नहीं होता - 1. रोग-ग्रस्त, 2. स्वभाव से क्रोधी और चिड़चिड़ा,
3. विषयी - मदिरासेवन, द्यूत-क्रीड़ा तथा वेश्यागमन आदि विषयों में आसक्त
अथवा किसी अन्य स्त्री में अनुरक्त तथा 4. शास्त्र मर्यादा का पालन न करने वाला।
कानीनश्च सहोढश्च गूढायां यश्च जायते।
तेषां वोढा पिता श्रेयस्ते च भागहराः स्मृताः ॥ 17 ॥
निम्नोक्त तीन प्रकार के पुत्रों वाली स्त्री, जिस भी पुरुष से विवाह करती है,
वे बालक उसकी सम्पत्ति में से अपना भाग पाने के अधिकारी होते हैं, 1. कानीन-
अविवाहिता कन्या द्वारा जना गया, 2. सहोढ़ - पूर्व से गर्भवती स्त्री का विवाह हो
जाने के उपरान्त उत्पन्न तथा 3. गूढ़ज - गुप्त रूप से जना।
टिप्पणी - 'विवाह रत्नाकर' ग्रन्थ के लेखक तथा मनु, याज्ञवल्क्य और
वसिष्ठ आदि स्मृतिकारों के अनुसार-नाना के पुत्रहीन होने पर 'कानीन' और
'सहोढ़' पुत्रों पर उस (नाना) का ही अधिकार होता है। नाना के पुत्रवान् होने पर
उन पुत्रों पर कन्या से विवाह करने वाले का अधिकार होता है। दोनों-नाना
(कन्या के पिता) और कन्या से विवाह करने वाले के निपूता होने पर उन दोनों
प्रकार के पुत्रों पर दोनों का समान अधिकार है-
"अत्रापुत्रो यदि मातामहस्तदा तस्य पुत्रः कानीनः सहोढश्च । सपुत्र-
श्चेत्तदा वोढुः उभयोर्पुत्रत्वे चोभयोरिति पारिजातः ।"
किन्हीं स्मृतिकारों ने वाग्दत्ता, परन्तु अविवाहिता कन्या के गर्भवती हो जाने
और विवाह के उपरान्त जन्म दिये जाने वाले पुत्र को कानीन माना है। दोनों में एक
अन्य अन्तर यह माना है कि कानीन के पिता का नाम ज्ञात नहीं होता और सहोढ़
के पिता का नाम ज्ञात होता है। अभिप्राय यह है कि वह अपने पिता - गर्भवती स्त्री
से विवाह करने वाले-का ही पुत्र होता है। दोनों अपने पर संयम न रख पाने के
कारण विवाह से पूर्व रति-भोग में प्रवृत्त हो जाते हैं। कन्या गर्भवती हो जाती है
और पुरुष इस गर्भ को अपना ही रक्त जानकर सगर्भा से विवाह कर लेता है।
अज्ञातपितृको यश्च कानीनोऽनूढमातृकः ।
मातामहाय दद्यात् स पिण्डं रिक्थं हरेत च ॥ 18 ॥
यदि कानीन पुत्र को जनने वाली कन्या का विवाह नहीं होता और उसका
पिता भी उसे ग्रहण करने को प्रस्तुत नहीं होता, अर्थात् वह अपने को प्रकाश में नहीं
लाता, तो ऐसा पुत्र नाना का ही पुत्र होता है, वह नाना का ही पिण्डदान करता है
और उसकी सम्पत्ति से ही अपना भाग प्राप्त करता है।
जाता ये त्वनियुक्तायामेकेन बहुभिस्तथा ।
आरिक्थभाजः सर्वे स्युर्बीजिनामेव ते सुताः ॥ 19 ॥
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सन्तान के उत्पन्न करने में असमर्थ पति द्वारा अनियुक्त (अनुमति प्राप्त किये
बिना) किसी एक अथवा अनेक पुरुषों के वीर्य को धारण करने वाली स्त्री से
उत्पन्न पुत्रों को माता के पति की सम्पत्ति पाने का कोई अधिकार नहीं। वस्तुतः वे
अपने पिता के पुत्र न होकर, अपनी मां को गर्भवती बनाने वालों के ही पुत्र होते हैं।
दद्युस्ते बीजिनो पिण्डं माता चेच्छुल्कतोहृता।
अशुल्कोपगतायां तु पिण्डदा वोढुरेव ते॥ 20॥
शुल्क लेकर गर्भवती बनी स्त्री से उत्पन्न पुत्र, स्त्री के पति के पुत्र कहलाते
हैं। बिना शुल्क लिये गर्भवती बनायी गयी स्त्री से उत्पन्न पुत्र, अपने जनक के पुत्र
होते हैं, माता के पति की सम्पत्ति पर उनका कोई अधिकार नहीं होता।
पितृद्विट् पतितः षण्ढो यश्च स्यादौपपातिकः।
औरसा अपि नैतेंऽशं लभेरन् क्षेत्रजाः कुतः॥ 21॥
शुल्क लेकर पुत्रोत्पादन के लिए किसी पुरुष की अंकशायिनी बनने वाली
स्त्री के गर्भ से उत्पन्न पुत्रों को, अपने पिता (माता के पिता) को पिण्ड देने का
और उसकी सम्पत्ति में से भाग पाने का अधिकार होता है। बिना शुल्क लिये पर-
पुरुष से जने पुत्रों का अपने जनकों को ही पिण्डदान का तथा उनकी सम्पत्ति से
अपना भाग पाने का अधिकार होता है। माता के पति से उनका किसी प्रकार का
कोई सम्बन्ध नहीं होता।
दीर्घतीव्रामयग्रस्ता जडोन्मत्तान्धपङ्गवः।
भर्तव्याः स्युः कुले चैते तत्पुत्रास्त्वंशभागिनः ॥ 22 ॥
परिवार के निम्नोक्त व असामान्य स्थिति के सदस्यों का पालन पोषण करना
चाहिए और उनकी सामान्य स्थिति के पुत्रों को सम्पत्ति में से यथोचित भाग देना
चाहिए-

  1. दीर्घकालव्यापी तथा तीव्र कष्ट देने वाले किसी रोग-राजयक्ष्मा, उदरशूल,
    कैंसर, हृदयरोग, पक्षाघात तथा गुर्दे का क्षरण आदि से आक्रान्त।
  2. जड़-अशिक्षित अथवा मन्दबुद्धि।
  3. उन्मत्त, मस्तिष्क विकार से ग्रस्त तथा
  4. विकलांग-नेत्रविहीन अथवा पंगु अथवा हाथों से काम न कर पाने
    वाले।
    द्विरामुष्यायणा दद्युर्द्वाभ्यां पिण्डोदके पृथक्।
    रिक्थादर्धं समादद्युर्बीजिक्षेत्रिकयोस्तथा ॥ 23 ॥
    दोनों-वीर्यदान करने वाले और क्षेत्र के स्वामी-के द्वारा अपनाये गये पुत्र
    को दोनों-जनक और माता के पति के-पिण्डदान का तथा उनकी सम्पत्ति को
    नारदस्मृति / 229
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पाने का अधिकार है। उनके यदि अन्य पुत्र भी हों, तो ऐसे पुत्र को अपना भाग ही
पाने का अधिकार होता है।
संसृष्टानां तु यो भागस्तेषामेव स इष्यते।
अनपत्योऽशभाग्योऽपि निर्बीजेष्वितरानियात् ॥ २४ ॥
विभक्त होने के उपरान्त पुनः संयुक्त हुए भाइयों में से किसी एक भाई के
पुत्रहीन होने पर, उसके भाग पर उसकी पत्नी का अधिकार होता है। पत्नी के भी
मरने पर, लड़की-दामाद का उस सम्पत्ति पर अधिकार होता है, परन्तु मृत भाई के
निस्सन्तान और पत्नी के भी मर जाने पर, उसके भाग की सम्पत्ति पर सभी भाइयों
का समान अधिकार होता है।
भ्रातृणामप्रजाः प्रेयात्कश्चिच्चेत् प्रव्रजेत् वा।
विभजेरन्धनं तस्य शेषास्तु स्त्रीधनं विना ॥ २५ ॥
सन्तान अथवा पुत्रहीन भाई के मर जाने पर अथवा उसके संन्यासी हो जाने
पर उसके स्त्रीधन को छोड़कर शेष भाग को सभी भाइयों को बराबर बांट लेना चाहिए।
भरणं चास्य कुर्वीरन् स्त्रीणामाजीवितक्षयात् ।
रक्षन्ति शय्यां भर्तुश्चेदाच्छिन्द्युरितरासु च ॥ २६ ॥
मृत भाई की साध्वी एवं आचारपरायण पत्नी का जीवनपर्यन्त भरण-पोषण
करना, उसका भाग पाने वाले भाइयों का नैतिक एवं वैधिक (कानूनी) दायित्व है।
हां, स्त्री के कुलटा होने पर तो उसके पास के धन को भी छीन लेना चाहिए तथा
उसे घर से बाहर निकाल देना चाहिए।
या तस्य दुहिता तस्याः पित्र्यँऽशो भरणे मतः ।
वासंस्कारं भजेरंस्तां परतो विभृयात् पतिः ॥ २७ ॥
मृत भाई (अथवा विधवा भाभी) की लड़की आदि के भरण-पोषण तथा
विवाह आदि संस्कार पर होने वाला व्यय, पैतृक-सम्पत्ति में उसके भाग से पृथक्-
सुरक्षित रखना चाहिए। विवाह से पूर्व भतीजी की रक्षा और उसके भरण-पोषण
का दायित्व उसके चाचाओं पर होता है। विवाह के उपरान्त इस दायित्व को उसका
पति ही वहन करता है।
मृते भर्तर्यपुत्रायाः पतिपक्षः प्रभुः स्त्रियाः ।
विनियोगात्मरक्षासु भरणे च स ईश्वरः ॥ २८ ॥
पुत्रहीना स्त्री के विधवा हो जाने पर पति के परिवार वाले-श्वसुर, ज्येष्ठ
और देवर आदि-ही उसके स्वामी होते हैं। उसके भरण पोषण एवं उसकी सुरक्षा
का दायित्व निभाने वालों को यह भी अधिकार है कि वह उनकी अनुमति के बिना
लेन-देन से सम्बन्धित कोई भी व्यापार आदि न करे; क्योंकि हानि होने पर भुगतान
का भार भी उन पर ही पड़ता है।
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