नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
by देवर्षि नारद
Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)
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Read in contextद्विकं शतं वा गृह्णीत सतां वृत्तमनुस्मरन्।
द्विकं शतं हि गृह्णानो न भवत्यर्थकिल्विषी ॥ 101 ॥
वर्ण-भेद का विचार किये बिना सभी जाति और वर्ण के ऋणकर्ताओं में एक
समान दो रुपया प्रतिशत प्रति माह ब्याज वसूल करना तो ऋणदाता की सज्जनता का
ही परिचायक है, अर्थात् यह दर साहूकार के उदार, मानवतावादी एवं धर्मभीरु
दृष्टिकोण को सिद्ध करती है। दो रुपये प्रतिशत ब्याज लेने वाले साहूकार को
अर्थकिल्विषी-पाप से धन कमाने वाला-कभी नहीं माना जा सकता।
टिप्पणी-लगता है कि प्राचीनकाल में आर्थिक शोषण को धर्म द्वारा मान्यता
प्राप्त थी, अन्यथा पांच प्रतिशत अथवा दो प्रतिशत ब्याज की वसूली को उदारता का
प्रतीक कदापि न कहा जाता।
कालिका कारिता चैवं कायिका च तथा परा।
चक्रवृद्धिश्च शास्त्रेऽस्मिन् वृद्धिर्दृष्टा चतुर्विधा ॥ 102 ॥
शास्त्रों में मूलधन पर लाभ के रूप में वसूल किये जाने वाले ब्याज के चार
रूप-भेदों का उल्लेख हुआ है-कालिका, कारिता, कायिका और चक्रवृद्धि।
प्रतिमासं स्रवन्ती या वृद्धिः सा कालिका स्मृता।
वृद्धिः सा कारिता नाम यर्णिकेन स्वयं कृता ॥ 103 ॥
प्रतिमाह चुकता किये जाने वाला ब्याज कालिका कहलाता है। ऋणी द्वारा
अपनी सुविधा के अनुसार प्रतिमाह अथवा दूसरे-तीसरे माह वृद्धि समेत, अर्थात्
जिस माह नहीं चुकाया, उस माह की ऋण-राशि पर बनने वाले ब्याज के सहित
अथवा बग़ैर यथानिर्धारित दूसरे-तीसरे माह चुकाया जाने वाला ब्याज कारिता
कहलाता है।
कायाविरोधिनी शश्वत्पणपादादि कायिका।
वृद्धेरपि पुनर्वृद्धिश्चक्रवृद्धिरुदाहृता ॥ 104 ॥
मूलधन के साथ ब्याज को जोड़कर किश्तों में उसका भुगतान कायिका तथा
मूलधन के साथ एक-मुश्त चुकाये जाने वाले ब्याज पर ब्याज की वसूली चक्रवृद्धि
कहलाती है।
अर्थानां सार्वभौमोऽयं विधिर्वृद्धिकरः स्मृतः।
या देशावस्थितिस्त्वन्या यत्रर्णमवतिष्ठते ॥ 105 ॥
ब्याज की वसूली के रूप में ऋण-राशि पर होने वाली इन चार रूपों वाली
परम्परा को एक सामान्य परम्परा ही समझना चाहिए। वैसे तो यह एक सार्वदेशिक-
पूरे देश के सभी भागों में-रूप से मान्य एवं प्रचलित पद्धति है, फिर भी लेन देन
करने वालों की इच्छा, आवश्यकता, स्थान-विशेष पर और समय विशेष में प्रचलन
आदि के अनुसार ऋण व्यवस्था-ब्याज की दर में घटा बढ़ी या मूलधन लौटाने
की रीति आदि-में यथोचित एवं यथावश्यक परिवर्तन किया जा सकता है।
नारदस्मृति / 91