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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 92 of 304

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Page 92

यदृणादिषु सर्वेषु बलवत्युत्तरा क्रिया।
प्रतिग्रहाधिक्रीतेषु पूर्वा पूर्वा बलीयसी ॥ 97 ॥
ऋण के लेन देन से जुड़े सभी विषयों में परवर्ती (आगे से आगे की) स्थिति
प्रमाण स्वरूप होती है। दान (उपहार, पुरस्कार) तथा बन्धक आदि से जुड़े
विषयों में किये गये अनुबन्धों में पूर्व-पूर्व की प्रामाणिकता अधिक है।
अभिप्राय यह है कि ऋण के लेन-देन में कब कितना लिया-दिया, कब
चुकाया और कब कितना बक़ाया छोड़ा—इस मामले में उत्तरोत्तर स्थिति ही मान्य
होती है। इसके विपरीत दान, भेंट आदि के मामले में जो पूर्वस्थिति है, वही मान्य
होती है, उसमें किये गये परिवर्तन-परिवर्द्धन को विधिसम्मत मान्यता प्राप्त नहीं है।
स्थानलाभनिमित्तं हि दानग्रहणमिष्यते।
तत्कुसीदमिति प्रोक्तं तेन वृत्तिः कुसीदिनाम् ॥ 98 ॥
लाभ-अर्जन के लिए ऋण-रूप में दिये मूलधन में जुड़ी ब्याज की राशि—
बढ़े हुए धन की वसूली के लिए किये गये प्रयास, धन के आदान-प्रदान का नाम
कुसीद है। दूसरे शब्दों में जब यह कहा जाये कि मूलधन तो आता रहेगा, कोई बात
नहीं, पर ब्याज की राशि का भुगतान तो त्वरित ही हो जाना चाहिए, तो धन के इस
अंश का लेन-देन ही साहूकारा है और साहूकारों की तो यह वृत्ति है, अर्थात् इसमें
किसी प्रकार का कोई पाप, दोष अथवा अनौचित्य नहीं है। ऋणदाताओं की तो
आजीविका ही इस प्रकार चलती है।
वसिष्ठविहितां वृद्धिं सृजेद् वृत्तिविवर्धनीम्।
अशीतिभागं गृह्णीयाच्छते मासस्य बार्धुषी ॥ 99 ॥
महर्षि वसिष्ठ के अनुसार साहूकार ब्याज पर दिये धन पर 80-125 पैसे तक
प्रतिशत प्रतिमास ब्याज वसूल कर सकता है। ब्याज की इस दर को न्यायसंगत ही
मानना चाहिए। वस्तुतः मूलधन पर ब्याज की वसूली करना तो साहूकार की
आजीविका का साधन होने से धर्मसम्मत ही कहलाता है। साहूकार द्वारा मूलधन
देकर ब्याज कमाना तो उसका व्यवसाय-धन्धा है।
द्विकं त्रिकं चतुष्कं च पञ्चकं च समं स्मृतम्।
मासस्य वृद्धिं गृह्णीयाद् वर्णानामनुपूर्वशः ॥ 100 ॥
ऋणदाता साहूकार को ऋणकर्ता के वर्ण के अनुसार भिन्न-भिन्न दरों पर
उससे अपने मूलधन पर ब्याज वसूल करने का अधिकार है। उदाहरणार्थ, ब्राह्मण,
क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र से क्रमशः दो, तीन, चार और पांच प्रतिशत ब्याज लेना
सर्वथा उचित एवं धर्मसंगत है।
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