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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 86 of 304

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Page 86

अभिप्राय यह है कि यदि व्यक्ति अपनी अचल सम्पत्ति पर अपना अधिकार
अक्षुण्ण रखना चाहता है, तो सर्वप्रथम उसे किसी दूसरे व्यक्ति को उस सम्पत्ति के
उपभोग की अनुमति ही नहीं देनी चाहिए और यदि किसी ने बलपूर्वक अधिकार
कर लिया है, तो उसके विरुद्ध नैतिक एवं क़ानूनी कार्यवाही करनी चाहिए। अपनी
सम्पत्ति पर दूसरों के अधिकार को उपेक्षणीय विषय नहीं समझना चाहिए। इस
सम्बन्ध में की गयी उपेक्षा का परिणाम सम्पत्ति से हाथ धो बैठना होता है।
अजडश्चेदपोगण्डो विषये चास्य भुज्यते।
भग्नं तद्व्यवहारेण भोक्ता तद्धनमर्हति ॥ 80 ॥
अचल सम्पत्ति के स्वामी के अवयस्क तथा अजड़ (अविकसित मस्तिष्क)
न होने पर, उसकी जानकारी में उसकी सम्पत्ति का उपभोग करने वाला दूसरा
व्यक्ति उस सम्पत्ति का पक्का एवं सच्चा स्वामी बन जाता है।
अभिप्राय यह है कि यदि अचल सम्पत्ति का स्वामी बालक है अथवा
मन्दबुद्धि है, तो उसकी सम्पत्ति का दूसरों द्वारा उपभोग किये जाने पर भी क़ानून
मूल स्वामी के अधिकार को संरक्षण प्रदान करता है; क्योंकि क़ानून अनुचित लाभ
उठाने की अनुमति कदापि नहीं देता। इसके विपरीत स्वामी के पूर्ण युवा तथा
सामान्य बुद्धि का होने पर, यदि वह अपनी सम्पत्ति का दूसरों द्वारा उपयोग किया
जाता देखकर भी मौन रहता है, उपेक्षा का भाव दिखाता है अथवा विरोध प्रदर्शन
नहीं करता है, तो निश्चित है कि उसे उस सम्पत्ति में कोई रुचि नहीं। ऐसे व्यक्ति
का अपनी सम्पत्ति पर स्वामित्व निरस्त हो जाता है और वह सम्पत्ति उपभोक्ता के
स्वामित्व में चली जाती है।
टिप्पणी— वररुचि ने विकलांग को भी जड़ मानते हुए उसे संरक्षण प्रदान
किया है। उनके अनुसार क़ानून को विकलांग की सम्पत्ति के दूसरे व्यक्ति द्वारा
उपभोग को कभी मान्यता नहीं देनी चाहिए—
शरीरपाणिचरणैर्निसर्गेणशरीरिणः ।
विकलाः सद्भिरुच्यन्ते पोगण्डकुणिपुंगवः ॥
आधिः सीमा बालधनं निक्षेपोपनिधी स्त्रियः ।
राजस्वं श्रोत्रियद्रव्यं न भोगेन प्रणश्यति ॥ 81 ॥
निम्नोक्त स्थितियों में दूसरों द्वारा अचल सम्पत्ति का उपभोग किये जाने पर भी
उस पर मूल स्वामी का स्वामित्व निरस्त नहीं होता—

  1. बन्धक रखी गयी सम्पत्ति किसी भी समय— यदि अवधि निर्धारित नहीं
    की गयी, तो ऋण को चुकता कर-छुड़ायी जा सकती है। ऐसी सम्पत्ति अवधि के
    निर्धारित होने और उसके बीत जाने पर भी, सम्पत्ति पर मूल स्वामी का स्वामित्व
    समाप्त नहीं हो जाता। हां, जुर्माना चुकाना पड़ता है, परन्तु स्वामित्व बना रहता है।
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