नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
by देवर्षि नारद
Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)
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Read in contextटिप्पणी—लोक में उक्ति प्रचलित है—'क़ब्ज़ा सच्चा, झगड़ा झूठा।' इसी
प्रकार बारह वर्षों तक किसी सम्पत्ति के अबाध उपभोग करने वाले को भारतीय
संविधान भी स्वामित्व का अधिकार देता है। भले ही उसने वह सम्पत्ति न खरीदी
हो और न ही उत्तराधिकार में पायी हो, फिर भी यदि बारह वर्षों तक अथवा उससे
अधिक समय तक उस सम्पत्ति पर अपना क़ब्ज़ा सिद्ध कर देता है, तो वह उसका
वास्तविक स्वामी बन जाता है।
विद्यमानेऽपि लिखिते जीवत्स्वपि हि साक्षिषु।
विशेषतः स्थावराणां यन्न भुक्तं न तत् स्थिरम् ॥ 77 ॥
लिखित प्रमाण और साक्षियों के जीवित होने, अर्थात् साक्ष्य उपलब्ध होने पर
भी जिस अचल सम्पत्ति पर व्यक्ति का क़ब्ज़ा नहीं है, अर्थात् जो दूसरे के अधिकार
में है, उस सम्पत्ति का स्वामी होते हुए भी व्यक्ति सच्चे अर्थों में स्वामी नहीं होता;
क्योंकि वह उस सम्पत्ति को न बेच सकता है, न बन्धक रख सकता है और न ही
उसका स्वयं उपयोग कर सकता है। इससे सिद्ध होता है कि सच्चा स्वामित्व तो
क़ब्ज़ा है और वही सर्वाधिक प्रबल प्रमाण है। जिस अचल सम्पत्ति पर अपना
क़ब्ज़ा नहीं, उसे अपनी मानना ही नहीं चाहिए।
भुज्यमानान् परैरर्थान् यः स्वामौर्ख्यादुपेक्षते।
समक्षं जीवितोऽप्यस्य तान् भुक्तिः कुरुते वशे ॥ 78 ॥
दूसरों द्वारा अपनी सम्पत्ति के उपभोग-उपयोग की उपेक्षा न करने, अर्थात्
दूसरों को अपनी सम्पत्ति का उपयोग न करने देने का परामर्श देते हुए स्मृतिकार
कहता है—दूसरों को अपनी सम्पत्ति का उपयोग करते देखकर उसे गम्भीरता से न
लेना, उसकी उपेक्षा करना, अर्थात् उन्हें अपनी स्थायी अचल सम्पत्ति का उपयोग
करने देना बहुत बड़ी मूर्खता है, जिसका परिणाम अत्यन्त भयंकर होता है। ऐसा
व्यक्ति अपने जीवनकाल में ही अपनी सम्पत्ति पर अपने स्वामित्व को गंवा बैठता
है। सब प्रकार के प्रमाणों के रहते हुए भी उसकी सम्पत्ति उपभोक्ता के हाथ में चली
जाती है। अतः किसी भी प्रकार से व्यक्ति को अपनी अचल सम्पत्ति पर किसी
दूसरे को, किसी भी प्रकार से क़ब्ज़ा नहीं करने देना चाहिए।
यत् किञ्चिद्दशवर्षाणि सन्निधौ प्रेक्षते धनी।
भुज्यमानं परैस्तूष्णीं न स तल्लब्धुमर्हति ॥ 79 ॥
अपने सामने अपनी सम्पत्ति का दूसरों को उपभोग करता देखकर भी निरन्तर
दस वर्षों तक मौन रहने वाले, अर्थात् उसे न रोकने-टोकने वाले और न ही किसी
प्रकार की कोई आपत्ति दर्ज कराने वाले व्यक्ति का उस सम्पत्ति पर से स्वामित्व
स्वतः ही निरस्त हो जाता है। उसके स्थान पर सम्पत्ति के उपभोग करने वाले का
उस सम्पत्ति पर नैतिक स्वामित्व स्थापित हो जाता है।
नारदस्मृति / 83