नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
by देवर्षि नारद
Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)
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Read in contextचतुर्विंशावरः पूर्वः परं षण्णवतिर्भवेत्।
चतुःशतपरो यश्च मध्यमो द्विशतावरः ॥ ३० ॥
सहस्त्रं तूत्तमो ज्ञेयः परः पञ्चशतावरः।
त्रिविधः साहसेष्वेवं दण्डः प्रोक्तः स्वयम्भुवा ॥ ३१ ॥
महर्षि मनु द्वारा अपनी स्मृति में किये गये निर्देश-उल्लेख के अनुसार-
नक़द 24-96 पणों (रुपयों) की (सौ पणों तक की), 200-400 पणों की तथा
500-1000 पणों की चोरी करने वाले को क्रमशः पूर्व साहस, मध्यम साहस तथा
उत्तम साहस दण्ड देना चाहिए।
प्रथमे ग्रन्थिभेदानामङ्गुल्यङ्गुष्ठयोर्वधः।
द्वितीये चैव तज्ज्ञेयं दण्डः पूर्वस्तु साहसः ॥ ३२ ॥
पहली बार जेब काटने का दण्ड चोर की अंगुलि और उसके अंगूठे को काट
देना है। इस अपराध को दुहराने वाले, अर्थात् दूसरी बार जेब काटने वाले को पूर्व
साहस दण्ड देना चाहिए।
गोषु ब्राह्मणसंस्थासु स्थूरायाश्छेदनं भवेत्।
दासीं तु हरतो नित्यमर्धपादविकर्तनम् ॥ ३३ ॥
ब्राह्मणों के स्वामित्व वाली गायों के हरण करने का दण्ड चोर के दोनों घुटनों
को नकारा कर देना है तथा ब्राह्मणों के स्वामित्व वाली दासी के अपहरण का दण्ड
चोर के पैरों को अधकटा बना देना है।
येन येन यथाङ्गेन स्तेनो नृषु विचेष्टते।
तत्तदेवावच्छेत्तव्यं तन्मनोरनुशासनम् ॥ ३४ ॥
चोर अपने जिस-जिस अंग से चोरी करता है, उसके उस-उस अंग को काट
देना ही उसके अपराध का दण्ड है। यही मनु की भी व्यवस्था है।
गरीयसि गरीयांसमगरीयसि वा पुनः।
स्तेने निपातयेद्दण्डं न यथा प्रथमे तथा ॥ ३५ ॥
देश-काल के अनुसार अपराध की गुरुता और लघुता के अनुरूप ही राजा
को गुरु तथा लघु दण्ड का विधान करना चाहिए। उदाहरणार्थ, सुभिक्ष में अन्न की
चोरी के लिए जिस दण्ड का विधान है, दुर्भिक्ष में उसी अपराध के लिए वही दण्ड
न्यायोचित नहीं है।
दश स्थानानि दण्डस्य मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत्।
त्रिषु वर्णेषु यानि स्युर्ब्राह्मणस्त्वक्षतः सदा ॥ ३६ ॥
मनु ने तीन-क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र-वर्णों के लोगों के द्वारा चौर्यादि के
लिए दण्ड का विधान किया है। ब्राह्मण को तो सर्वथा अदण्ड्य माना है। तीनों वर्णों
के अपराधियों के निम्नोक्त दस अंगों पर प्रहार किया जाना चाहिए।
नारदस्मृति / 269