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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

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उनका पालन-पोषण करता है।
3. राजा ही प्रजाजनों में उठने वाले विवादों (व्यवहारों) को सुनता है,
सत्य-असत्य का निर्णय करता है तथा अपराधी को दण्ड देता है।
4. राजा ही प्रजाजनों की आर्थिक समृद्धि के लिए विविध योजनाएं बनाता है
और उन योजनाओं की पूर्ति के लिए साधन जुटाता है तथा धन की व्यवस्था करता
है।
ब्राह्मणानुपसेवेत नित्यं राजा समाहितः।
संयुक्तं ब्राह्मणैः क्षात्रं मूलं लोकाभिवृद्धये॥ ३४॥
राजा को ब्राह्मणों के सम्मान की रक्षा के लिए नित्य-प्रति अत्यन्त सावधान
रहना चाहिए। उसे यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि ब्राह्मणों की कृपा बने रहने
पर ही राजा अपने क्षत्रिय-धर्म का सफलतापूर्वक निर्वाह कर सकता है। ब्राह्मणों
के रुष्ट होने पर तो राजा के लिए अपनी सत्ता को बचा पाना ही सम्भव नहीं होता।
ब्राह्मणस्यापरीहारो राजन्यासनमग्रतः।
प्रथमं दर्शनं प्रातः सर्वेभ्यश्चाभिवादनम्॥ ३५॥
विचारक के रूप में न्यायपीठ पर बैठते समय राजा को ब्राह्मणों—बुद्धिजीवी
शास्त्रज्ञ विद्वानों—को अपने से ऊंचे आसन पर बिठाना चाहिए। इसके अतिरिक्त
राजा को प्रतिदिन प्रातःकाल राज्यसभा में जाने से पूर्व ब्राह्मणों का दर्शन, उन्हें
प्रणाम करना और उनका आशीर्वाद लेना चाहिए।
अग्रं नवभ्यः सप्तभ्यः मार्गदानं च गच्छतः।
भैक्षहेतोः परागारे प्रवेशस्त्वनिवारितः॥ ३६॥
राजमार्ग, नौकायन तथा अन्य वाहन मार्गों पर संकरा मार्ग आ जाने पर
ब्राह्मणों—भले ही वह सात हों अथवा नौ, अर्थात् अधिक संख्या में ही क्यों न हों
और इसके लिए दूसरे यात्रियों को असुविधा, कष्ट और विलम्ब ही क्यों न होता
हो—को पहले जाने देना चाहिए। इसके अतिरिक्त भिक्षा मांगने वाले ब्राह्मण को
किसी भी घर में प्रवेश करने से नहीं रोकना चाहिए।
समित्पुष्पोदकादानेष्वस्तेयं स्वपरिग्रहम्।
अनपेक्षः परमेभ्यः सम्भाषणञ्च परस्त्रिया॥ ३७॥
अपने यज्ञ-भोग तथा पूजा-पाठ के लिए समिधाएं, पुष्प और जल आदि
इनके स्वामी से बिना पूछे अपने आप लेने वाले ब्राह्मण पर चोरी का आरोप नहीं
लगाया जा सकता। इसी प्रकार परमुखापेक्षी न बनने की इच्छा से पर स्त्री से
भाषण करने वाले ब्राह्मण की विरोधियों द्वारा भी निन्दा नहीं की जा सकती; क्योंकि
आचारनिष्ठ और चरित्रवान् होना तो ब्राह्मणत्व का प्रथम लक्षण है।
258 / नारदस्मृति