नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
by देवर्षि नारद
Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)
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Read in contextपृथिवी पर इनका प्रतिनिधि होता है और इसीलिए उसका तेज अपरिमित होता है।
कारणादनिमित्तं वा यदा क्रोधवशं गतः।
प्रजा दहति भूपालस्तदाग्निरभिधीयते ॥ २७ ॥
अकारण क्रुद्ध होकर निर्दोष, निरपराध एवं असहाय प्रजाजनों को पीड़ित
करने वाला राजा अग्नि-रूप कहा जाता है।
यदा तेजः समालम्ब्य विजिगीषुरुदायुधः ।
अभियाति परान् राजा तदेन्द्रः स उदाहृतः ॥ २८ ॥
अपनी तेजस्विता का स्मरण कर और आयुधों से सन्नद्ध होकर शत्रुओं के
दमन करने को कटिबद्ध राजा इन्द्र-रूप कहलाता है।
विगतक्रोधसन्तापो हृष्टरूपो यदा नृपः।
प्रजानां दर्शनं याति सोम इत्युच्यते तदा ॥ २९ ॥
क्रोध, शोक और सन्ताप आदि का परित्याग कर प्रसन्नचित्त होकर उल्लसित
भाव से प्रजाजनों से भेंट करने वाला राजा सोम-रूप कहलाता है।
धर्मासनगतः श्रीमान्दण्डं धत्ते यदा नृपः।
समः सर्वेषु भूतेषु तदा वैवस्वतः स्मृतः ॥ ३० ॥
न्यायाधीश के रूप में न्यायपीठ पर विराजमान होकर तटस्थ भाव से विवादों
को सुनने और वास्तविक अपराधी को दण्ड देने के लिए उद्यत तथा सभी प्रजाजनों
के प्रति समदृष्टि रखने वाला राजा विवस्वान् (यम) कहलाता है।
यदा त्वर्थिगुरुप्राज्ञभृत्यादीन् पृथिवीपतिः ।
अनुगृह्णाति दानेन तदा स धनदः स्मृतः ॥ ३१ ॥
आवश्यकता वालों, अभावग्रस्तों, भृत्यों, याचकों, गुरुजनों और विद्वानों को
दान-मान आदि देकर अनुग्रह प्रकट करने वाला राजा कुबेर-रूप होता है।
तस्मात्तं नावजानीयान्नाक्रोशेश्च विशेषतः ।
आज्ञायां चास्य तिष्ठेत् मृत्युः स्यात्तद्व्यतिक्रमात् ॥ ३२ ॥
इस प्रकार पांच देवों के अंशधारी पांच रूपों वाले राजा की आज्ञा का पालन
करना प्रजाजनों को अपने लिए अनिवार्य धर्म मानना चाहिए। राजाज्ञा के अतिक्रमण
का दण्ड तो निश्चित रूप से मृत्यु ही है।
तस्य धर्मः प्रजारक्षा वृद्धप्राज्ञोपसेवनम्।
दर्शनं व्यवहाराणामुत्थानं च स्वकर्मसु ॥ ३३ ॥
राजा अनेक रूपों में प्रजा का बहुत उपकार करता है—
- वह प्रजा के प्राण, सम्मान और सम्पत्ति आदि की रक्षा करता है। राजा
जागता है, तभी प्रजाजन निश्चिन्त होकर सोते और अपना व्यापार-धन्धा करते हैं। - राजा साधनहीन वृद्धों और विद्वानों को आर्थिक अनुदान प्रदान करके
नारदस्मृति / 257