नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
by देवर्षि नारद
Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)
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Read in contextद्व्यभियोगस्तु विज्ञेयः शङ्कातत्त्वाभियोगतः ।
शङ्का सतां तु संसर्गात्तत्त्वं होढाभिदर्शनात् ॥ २७ ॥
अभियोग दो प्रकार का होता है—
प्रथम, शंकाभियोग—असज्जन—न्याय को महत्त्व न देने वाले तथा अन्याय
में प्रवृत्त—के सम्पर्क में आने पर हानि की आशंका से किया जाने वाला अभियोग।
द्वितीय, तत्त्वाभियोग—किसी को दूसरे के धन को चुराता देखकर अपने
धन के चुराये जाने की आशंका से उत्पन्न होने वाला अभियोग।
'स्मृतिचन्द्रिका' में तत्त्वाभियोग को पुनः दो प्रकार का माना गया है—
प्रतिषेधात्मक तथा विधेयात्मक।
टिप्पणी—(1) स्मृतिचन्द्रिका व्यवहार के अनुसार—द्यूतकार और स्तेन
आदि दुर्जनों के साथ रहने वाले साधु-महात्मा द्वारा भी चोरी आदि किये जाने की
आशंका उत्पन्न हो जाती है—'कितवस्तेनाद्यसद्भिः संसर्गात्साध्वपि स्तेयादिशंका
भवति।' इससे तत्त्वाभियोग का निषेधात्मक रूप भी सिद्ध होता है।
(2) असहाय भाष्यकार ने अपने अधिकार वाले धन को धन तथा दूसरे द्वारा
अपहृत अथवा नष्ट धन को 'होढ़' कहा है—'स्वकीयं द्रव्यं द्रव्यं यन्नष्टं तत् होढ-
मुच्यते।'
पक्षद्वयाभिसम्बन्धाद् द्विद्वारं समुदाहृतः ।
पूर्ववादस्तयोः पक्षः प्रतिपक्षस्तदुत्तरम् ॥ २८ ॥
व्यवहार में दो पक्षों—वादी तथा प्रतिवादी अथवा व्यवहार करने वाला और
व्यवहार का केन्द्र, दूसरे शब्दों में शिकायत करने वाला और शिकायत का आधार
बनने वाला—की नित्य स्थिति के कारण व्यवहार को दो द्वारों वाला कहा जाता है।
वादी अथवा शिकायती को पक्षी और प्रतिवादी अथवा शिकायत का उत्तर देने वाले
को प्रतिपक्षी कहा जाता है।
भूतच्छलानुसारित्वाद्विगतिः स उदाहृतः ।
भूतं तत्त्वार्थसंयुक्तं प्रमादाभिहितं छलम् ॥ २९ ॥
व्यवहार में दो ही पहलू अपनाये जाते हैं—(1) सत्य का पक्ष ग्रहण किया
जाता है अथवा (2) छल-कपट को अपनाया जाता है। इस कारण व्यवहार की दो
गतियां मानी जाती हैं—भूत और छल।
टिप्पणी—'सरस्वती विलास' में सत्य व्यवहार के सत्रह और छल व्यवहार
के प्रकीर्ण के समान अनन्त भेद माने गये हैं—'भूतच्छलानुरोधेन द्विगतिः
समुदाहृता' इति व्यवहारस्य छलानुसारणं तत्त्वानुसारणमिति गतिद्वयमुक्तम्।
तत्र तत्त्वानुसारणेन सप्तदश विवादपदान्यनुक्रान्तानि। छलानुरणेन प्रकीर्णकाख्यं
विवादपदमनुक्रान्तमिति।
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