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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 205 of 304

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Page 205

युक्तमविधेया अविनेया अतिविरूपा च तस्मात् तव न ददामीति शुल्कप्रदाने
नास्त्यनृतदोषः।
स्पष्ट है कि कन्या को अधिक उपयुक्त वर देने की दृष्टि से पहले प्रस्ताव को
भंग करने के लिए झूठे बहाने बनाने में भी दोष नहीं माना गया। हमारे विचार में
कालान्तर में कुछ दुष्ट अभिभावकों द्वारा अपने लोभ की पूर्ति के लिए इस झूठ का
जमकर दुरुपयोग किया जाने लगा।
नादुष्टां दूषयेत् कन्यां नादुष्टं दूषयेद्वरम्।
दोषं तु सति नागः स्यादन्योन्यं त्यजतास्तयोः॥ ३१॥
दोष-रहित कन्या अथवा वर में सम्बन्ध स्थिर हो जाने के उपरान्त छिद्रान्वेषण
अथवा दोष-दर्शन जहां सर्वथा अनुचित है, वहां स्पष्ट दोष दिखाई देने पर कन्या
अथवा वर के त्यागने अथवा सम्बन्ध-विच्छेद करने में कोई दोष अथवा अनौचित्य
नहीं है।
दत्वा न्यायेन यः कन्यां वराय न ददाति ताम्।
अदुष्टश्चेद्दरो राज्ञा स दण्ड्यस्तत्र चौरवत्॥ ३२॥
भली प्रकार सोच विचार करके विधिपूर्वक कन्या का वाग्दान करने के
उपरान्त वर में किसी दोष के न होने पर तथा वर पक्षवालों के किसी अपराध के न
करने पर भी अपने वचन से मुकरने वाले, अर्थात् वाग्दत्ता कन्या का विवाह न
करने वाले कन्या के अभिभावक को प्रशासन द्वारा चोर के लिए निर्धारित दण्ड से
दण्डित करना चाहिए।
यस्तु दोषवतीं कन्यामनाख्याय प्रयच्छति।
तस्य कुर्यान्नृपो दण्डं पूर्वसाहसचोदितम्॥ ३३॥
किसी दोष- असाध्य रोग से पीड़ित, बोलने में हकलाना तथा चलने में
लड़खड़ाना आदि-से ग्रस्त कन्या के दोष को छिपाकर धोखे से उसे किसी के
मत्थे मढ़ने वाले, अर्थात् वर पक्षवालों को अंधेरे में रखने वाले कन्या के अभिभावक
(पिता आदि) को पूर्वसाहस का दण्ड देना चाहिए।
अकन्येति तु यः कन्यां ब्रूयाद् द्वेषेण मानवः।
स शतं प्राप्नुयाद्दण्डं तस्या दोषमदर्शयन्॥ ३४॥
किसी अक्षतयोनि कन्या को भुक्त (पुरुष विशेष से सम्बन्ध रखने वाली)
कहकर कलंकित करने वाले, परन्तु अपने आरोप को सिद्ध करने के लिए प्रमाण
न जुटा सकने वाले व्यक्ति से सौ पण दण्ड के रूप में वसूल करने चाहिए।
प्रतिगृह्य तु यः कन्यामदुष्टामृत्सृजेन्नरः।
स विनेयस्त्वकामोऽपि कन्यां तामेव चोद्वहेत्॥ ३५॥
दोषरहित कन्या के ग्रहण की सहमति देकर, अकारण उसका परित्याग करने
नारदस्मृति / 203