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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 198 of 304

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Page 198

के उपरान्त लड़का-लड़की पति पत्नी बन चुके होते हैं।
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परिग्रहे।
सजातिः श्रेयसी भार्या सजातिश्च पतिः स्त्रियाः ॥ 4 ॥
चारों—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—वर्णों के लड़कों के लिए सवर्ण
लड़की से पाणिग्रहण ही वाञ्छनीय एवं शुभ होता है, अर्थात् ब्राह्मण लड़के का
ब्राह्मण लड़की से, क्षत्रिय लड़के का क्षत्रिय लड़की से पाणिग्रहण ही उत्तम रहता
है। भिन्न वर्ण और जाति के लड़के द्वारा भिन्न जाति और वर्ण की लड़की का
पाणिग्रहण उपयुक्त नहीं माना जाता।
ब्राह्मणस्यानुलोम्येन स्त्रियोऽन्यास्तिस्र एव तु।
शूद्रायाः प्रातिलोम्येन तथान्ये पतयस्त्रयः ॥ 5 ॥
अनुलोम क्रम से ब्राह्मण लड़के को ब्राह्मण लड़की के अतिरिक्त अन्य
तीन—क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—लड़कियों से भी विवाह करने का अधिकार है।
इसी प्रकार शूद्र लड़की को शूद्र लड़के के अतिरिक्त अन्य तीन वर्णों के लड़के को
भी पति बनाने का अधिकार है।
द्वे भार्ये क्षत्रियस्यान्थे वैश्यस्यैका प्रकीर्तिता।
वैश्याया द्वौ पती ज्ञेयाविकोऽन्यः क्षत्रियापतिः ॥ 6 ॥
इसी प्रकार क्षत्रिय बालक, क्षत्रिया बालिका के अतिरिक्त दो अन्य वर्णों—
वैश्य और शूद्र—की बालिकाओं से—विवाह कर सकता है। वैश्य अपने वर्ण की
वैश्य बालिका के अतिरिक्त शूद्रा से भी विवाह कर सकता है। इस प्रकार वैश्या स्त्री
के दो अन्य पति—क्षत्रिय और ब्राह्मण—तथा क्षत्रिया का एक अन्य पति—ब्राह्मण—
हो सकता है।
आ सप्तमात् पञ्चमाद्वा बन्धुभ्यः पितृमातृत्तः।
अविवाह्याः सगोत्राः स्युः समानप्रवरास्तथा ॥ 7 ॥
पितृपक्ष की सात पीढ़ियों और मातृपक्ष की पांच पीढ़ियों को छोड़कर ही
लड़का लड़की का विवाह सम्बन्ध स्थिर करना चाहिए। सपिण्डों और सगोत्रियों
में रक्त-सम्बन्ध होने के कारण विवाह सम्बन्ध उचित नहीं; क्योंकि इससे स्वस्थ
एवं बल बुद्धि सम्पन्न सन्तान के उत्पन्न होने की सम्भावना के आगे प्रश्नचिह्न
लग जाता है।
परीक्ष्य पुरुषः पुंसत्वे निजैरेवाङ्गलक्षणैः।
पुमांश्चेदविकल्पेन स कन्यां लब्धुमर्हति ॥ 8 ॥
अपने शरीर के लक्षणों से कन्या के लिए चुने जा रहे लड़के के शरीर की
तुलना और जांच परख करने पर व उसके पुरुषत्व का निश्चय हो जाने के उपरान्त
ही उसे कन्या देने का विचार बनाना चाहिए, अर्थात् सच्चे अर्थों में पुरुष—कन्या
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