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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 197 of 304

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Page 197
  1. स्त्री-पुरुष-योग
    विवाहादिविधः स्त्रीणां यत्र पुंसां च कीर्त्यते।
    स्त्रीपुंसयोगनामैतद्विवादपदमुच्यते ॥ 1 ॥
    दो भिन्न परिवार के स्त्री और पुरुष के विवाह-विधि से एक हो जाने का
    नाम 'स्त्री-पुरुष-योग' है। यहां भी आपसी मनमुटाव और कलह के कारण विवाद
    उत्पन्न हो जाते हैं, जिसे सुलझाने के लिए व्यवहार का आश्रय लिया जाता है। इसी
    का नाम 'स्त्री-पुरुष-योग' है।
    स्त्रीपुंसयोस्तुसम्बन्धे वरणं प्राग् विधीयते।
    वरणाद् ग्रहणं पाणेः संस्कारोऽथ द्विलक्षणः ॥ 2 ॥
    स्त्री और पुरुष अथवा कन्या और बालक अथवा वधू और वर के परस्पर
    योग से पूर्व वरण-लड़की के लिए लड़के का और लड़के के लिए लड़की का
    चुनाव-होता है। इन चुनाव पर मोहर लगाने की क्रिया का नाम सगाई अथवा
    वाग्दान है, अर्थात् लड़की और लड़के के माता-पिता द्वारा अपने बच्चों के लिए
    उपयुक्त जीवनसाथी चुन लेने को सार्वजनिक करना है। यह इस दिशा का प्रथम
    चरण है। इसके उपरान्त द्वितीय चरण है-अग्नि के समक्ष दोनों-लड़की और
    लड़के-द्वारा जीवनपर्यन्त एक-दूसरे का साथ निभाने की प्रतिज्ञा करना। इसी का
    नाम पाणिग्रहण-लड़के द्वारा लड़की का हाथ पकड़ना, उसके भरण-पोषण का
    दायित्व लेना, उसे अपने व्यक्तित्व का भागी बनाना-है। यही विवाह एवं सप्तपदी
    कहलाता है।
    इस प्रकार स्त्री और पुरुष के सम्बन्ध के जुड़ने के दो चरण हैं- चुनाव और
    प्रतिज्ञा अथवा वरण और धारण।
    तयोरनियतं प्रोक्तं वरणं दोषदर्शनात्।
    पाणिग्रहणमन्त्रश्च नियतं दारलक्षणम् ॥ 3 ॥
    वरण अथवा वाग्दान (सगाई) किये जाने पर लड़की लड़के का योग नहीं
    हो जाता है। योग तो विवाह में मन्त्रोच्चारण के उपरान्त ही होता है। अतः यदि
    सगाई के उपरान्त लड़की-लड़के में किसी दोष का पता चल जाता है, तो सम्बन्ध
    तोड़ा जा सकता है, परन्तु विवाह हो जाने (सम्भोग-क्रिया हो जाने) के उपरान्त
    दोनों में किसी दोष के दीखने पर सम्बन्ध विच्छेद नहीं किया जा सकता। विवाह
    नारदस्मृति / 195