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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 195 of 304

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Page 195

भरपाई की मांग करनी चाहिए। हां, नथुनों की रस्सी तुड़ाकर खेत में घुस आने
वाले और कृषि की हानि करने वाले बैल को न रोकने वाले रक्षक से हानि का चार
गुना दण्ड के रूप में वसूल करना चाहिए।
सन्नानां द्विगुणः प्रोक्तो वसतां तु चतुर्गुणः।
प्रत्यक्षचारकाणां तु चौरदण्डः स्मृतो नृणाम् ॥ 34 ॥
दूसरे के खेत में घुसकर उसकी उपज को खाकर तृप्त-मस्त हुई और पूरी रात
वहीं आराम करती गाय को ढूंढ़ते-फिरते गोपालक से खेत की हानि का दुगुना तथा
दूसरे के खेत की उपज को खाती गाय को अनदेखा करने वाले गोपालक से चार
गुना वसूल करना चाहिए, परन्तु अपनी उपस्थिति में गाय को दूसरे की उपज को
खाने से निवारण न करके प्रोत्साहित करने वाले पशुपालक को तो चोर के लिए
निर्धारित दण्ड द्वारा दण्डित करना चाहिए।
या नष्टाः पालदोषेण गावः क्षेत्रं यदाप्नुयुः।
न तत्र गोभिनां दण्डः पालस्तं दण्डमर्हति ॥ 35 ॥
गायों के रक्षक द्वारा गायों को नियन्त्रण में न रखने अथवा उनकी सही ढंग
से देखभाल न करने के दोष के कारण गायों के दूसरे के खेतों में घुसकर फ़सल
खाने-उजाड़ने के लिए गायों के मालिक को नहीं, अपितु रखवाले को ही उत्तरदायी
ठहराना चाहिए और उसी को तदनुरूप दण्डित करना चाहिए।
राजग्राहगृहीतो वा वज्राशनिहतोऽपि वा।
अथ सर्पेण दष्टो वा वृक्षाद्वा पतितो भवेत्॥ 36 ॥
व्याघ्रादिभिर्हतो वापि व्याधिभिर्वाप्युपद्रुतः ।
न तत्र दोषः पालस्य न च दोषोऽस्ति गोभिनाम् ॥ 37 ॥

  1. राजपुरुषों द्वारा पकड़े गये, 2. बिजली गिरने से मर गये, 3. सांप के
    काटने से मृत, 4. वृक्ष अथवा वृक्ष की शाखा के गिरने से उसके नीचे दबकर मरे,
  2. व्याघ्र आदि हिंसक जीवों का शिकार बने अथवा विभिन्न रोगों की विषमता से
    तथा दैवी आपत्ति-भूकम्प, भयंकर आंधी-तूफान, गड्ढे में गिरना तथा पशुओं में
    मची भगदड़ आदि-में प्राण छोड़ने वाले पशुओं के लिए न तो पशुपालक को और
    न ही पशुओं के स्वामी को दोषी ठहराया जा सकता है।
    गोभिस्तु भक्षितं धान्यं यो नरः प्रतियाचते।
    सामन्तानुमते देयं धान्यं यत्तत्र भक्षितम् ॥ 38 ॥
    यदि क्षेत्र का स्वामी अपने क्षेत्र में घुसे दूसरे के पशुओं द्वारा किये गये अपनी
    उपज के विनाश की भरपाई की मांग करता है और सामन्त इससे सहमति प्रकट
    करते हैं, तो गोपालक को उसकी मांग को पूरा करना चाहिए, अर्थात् क्षतिपूर्ति में
    टाल-मटोल नहीं करनी चाहिए।
    नारदस्मृति / 193