नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
by देवर्षि नारद
Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)
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Read in contextकी हानि कर रहे गाय बैल आदि पशुओं को हटाने भगाने का उद्यम न करने पर
उसे यथोचित रूप से दण्डित करना चाहिए।
समूलसस्यघाते तु तत् स्वामी सममाप्नुयात्।
वधेन पालो मुच्येत दण्डं स्वामिनि पातयेत्॥ २९॥
गाय बैल आदि पशुओं द्वारा पूरी उपज खाये जाने अथवा रौंदे जाने के रूप
में नष्ट किये जाने पर क्षेत्र के स्वामी को जहां रक्षक को दण्ड देना चाहिए, वहां
पशुओं के स्वामी को, न केवल क्षेत्रपाल को अपनी हानि की भरपाई करनी चाहिए,
अपितु प्रशासन को दण्ड के रूप में निर्धारित धन राशि का भुगतान भी करना
चाहिए।
गौः प्रसूता दशाहं च महोक्षो वाजिकुञ्जरौ।
निवार्याः स्युः प्रयत्नेन तेषां स्वामी न दण्डभाक्॥ ३०॥
दस दिन की प्रसूता गाय तथा बलवान् एवं उच्छृंखल-बन्धन में न रखे जा
सकने वाले-अश्व, गज, वृषभ आदि द्वारा कृषि-शस्य की हानि किये जाने पर
क्षेत्रपाल को अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए उन्हें क्षेत्र में घुसने से रोकना चाहिए।
ऐसे पशुओं के स्वामी से हानि की भरपाई की मांग नहीं की जा सकती।
माषं गां दापयेद्दण्डं द्वौ माषौ महिषी तथा।
अजाविके सवत्से तु दण्डः स्यादर्धमाषकः॥ ३१॥
गाय, भैंस और अपने बच्चे (मेमने) सहित भेड़ बकरी द्वारा कृषि की हानि
किये जाने पर क्रमशः एक माशा (ग्राम), दो माशा और आधा माशा स्वर्ण, दण्ड
के रूप में इनके स्वामी को देय होता है।
अदण्ड्या हस्तिनोऽश्वाश्च प्रजापाला हि ते मताः।
अदण्ड्याऽऽगन्तुकी गौश्च सूतिका वाऽभिसारिणी॥ ३२॥
गजों और अश्वों द्वारा उपज के खाने-खराब करने पर भी उन्हें दण्डित नहीं
करना चाहिए; क्योंकि वे प्रजापालक होने के कारण किसी भी कारण से दण्डनीय
नहीं हैं। इस प्रकार बाहर से खरीदकर लायी गयी, सद्यःप्रसूता अथवा वृषभ के
साथ आयी गाय भी कृषि शस्य को खाने-उजाड़ने के लिए कदापि दण्डनीय नहीं
होती; क्योंकि ऐसी गाय भी दण्ड की सीमा के बाहर होती है।
नष्टा भग्ना च लग्ना च वृषभः कृतलक्षणः।
प्रोक्तं तु च्छिद्रनासायां वसन्त्यां तु चतुर्गुणम्॥ ३३॥
गाय-भैंस आदि चराने वाले पशुपालक के झुण्ड से बिछुड़ी, घायल तथा पैरों
में लगी चोट के कारण चलने में असमर्थ गाय द्वारा तथा गायों को गर्भिणी बनाने के
लिए चिह्नित और छोड़े गये सांड द्वारा हुई कृषि शस्य की हानि के लिए, न इन
पशुओं को और न ही रक्षक को दण्ड देना चाहिए और न ही इनके स्वामियों से
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