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सर्वकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 19, कुल 304 में से

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पृष्ठ 19

गण—एक ही जाति अथवा सम्प्रदाय का प्रतिनिधित्व करने वाला श्रेष्ठ पुरुष।
मनोनीत—आज के नियमित नियुक्ति पाने वाले न्यायाधीशों के समान ही
राजा द्वारा नियुक्त योग्य न्यायविद्।
स्वयं राजा—इनमें पूर्व से ऊपर-ऊपर वरीय हैं, अर्थात् कुल से श्रेणी, श्रेणी
से गण, गण से अधिकृत न्यायाधीश तथा उससे ऊपर राजा है। प्रत्येक ऊपर वाला
न्यायाधिकरण नीचे वाली न्यायिक संस्था के निर्णय पर पुनः विचार करने में, यहां
तक कि उसके निर्णय को निरस्त करने में सक्षम है।
टिप्पणी—इसी तथ्य का समर्थन याज्ञवल्क्यस्मृति में भी हुआ है-
नृपेणाधिकृताः पूगाः श्रेणयोऽथ कुलानि च।
पूर्वं पूर्वं गुरुं ज्ञेयं व्यवहारविधौ नृणाम्॥
नारद के गण शब्द के स्थान पर ही याज्ञवल्क्य ने 'पूग' शब्द का प्रयोग किया
है।
आजकल भी न्याय-व्यवस्था के पांच स्तर हैं—कनिष्ठ न्यायाधीश (सब
जज), वरिष्ठ न्यायाधीश (सीनियर जज), मण्डल न्यायाधीश (सेशन जज), उच्च
न्यायालय (हाई कोर्ट) तथा सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट)।
राजा का स्थान आज के राष्ट्राध्यक्ष के समकक्ष समझना चाहिए। आज जिस
प्रकार सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को पलटने-क्षमायाचना को स्वीकार करने
आदि का अधिकार राष्ट्रपति को है, नारद वही स्थिति राजा की घोषित करते हैं।
स चतुष्पाच्चतुः स्थानश्चतुः साधन एव च।
चतुर्हितश्चतुर्व्यापी चतुष्कारी च कीर्त्त्यते ॥ 8 ॥
अष्टाङ्गोऽष्टादशपदः शतशाखस्तथैव च।
त्रियोनिर्द्व्यभियोगश्च द्विद्वारो द्विगतिस्तथा ॥ 9 ॥
यह विवाद-मुकदमा—चतुष्पाद, अर्थात्—धर्म, व्यवहार, चरित्र और राज-
शासन, चतुः स्थानीय, अर्थात्—सभ्य-साक्षी, पुस्तक, रण तथा राजा की आज्ञा,
चतुः साधन, अर्थात् चार साधनों-साम, दान, भेद और दण्ड, चतुर्हित, अर्थात्
चारों वर्णों—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—का हितसाधक, चतुर्व्यापी, कर्ता,
साक्षी, सभ्य तथा राजा को प्रभावित करने वाला, धर्म, अर्थ, यश तथा लोकरञ्जन
का साधक होने से चतुष्कारी-चार कार्यों का सम्पादक, राजा के अष्ट अंगों-
सन्धि, विग्रह, यान, आसन, संशय, द्वैधीभाव से सम्बन्धित होने के कारण अष्टांग
(आठ अंगों वाला), ऋणदान आदि अठारह विषयों वाला होने से अष्टादशमुखी,
शत-प्रतिशत शाखाओं वाला, काम, क्रोध और लोभ से उत्पन्न होने के कारण
त्रियोनि है। भीतर और बाहर भयोत्पादक होने से द्विमुख, वादी-प्रतिवादी के
सम्बन्ध से द्वि-द्वार तथा सत्य और छल से समन्वित रहने के कारण द्विःगति कहा
जाता है।
नारदस्मृति / 17