नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
by देवर्षि नारद
Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)
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Read in contextत्रिंशांशो रोमवद्धस्य क्षयः कर्मकृतस्य तु।
कौशेयवल्कलानां तु सैव वृद्धिर्न च क्षयः ॥ 15 ॥
पशु-पक्षियों के बालों से बने वस्त्रों का संस्कार करने पर तीस प्रतिशत का
क्षय हो जाता है। इसके विपरीत कौशेय (रेशम) और वल्कलों (वृक्ष की छाल)
से बने वस्त्रों का संस्कार करने पर न कुछ घटता है और न ही कुछ बढ़ता है, उनका
भार ज्यों का त्यों रहता है।
क्रीत्वा नानुशयं कुर्याद्वणिक् पण्यविचक्षणः।
वृद्धिक्षयौ तु जानीयात् पण्यानामागमं तथा ॥ 16 ॥
चतुर व्यापारी की व्यावसायिक दक्षता इसी में है कि उसे पण्य की वृद्धि,
उसके क्षय तथा उससे सम्भावित लाभ-हानि आदि पर भली प्रकार सोच-विचार
करने के उपरान्त ही लेन-देन अथवा क्रय-विक्रय करना चाहिए, ताकि पण्य
ख़रीदने-बेचने के पश्चात् उसे न तो चिन्तित होना पड़े और न ही किसी प्रकार का
पश्चात्ताप करना पड़े।
॥ चतुर्थ अध्याय का नवम प्रकरण समाप्त ॥
नारदस्मृति / 183