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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 181 of 304

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Page 181

तथान्यस्मै तु विक्रीतं योऽन्यस्मै सम्प्रयच्छति।
सोऽपि तद्द्विगुणं दाप्यो विनयं चैव राजनि॥ 8 ॥
इसी प्रकार एक क्रेता से पण्य का सौदा पक्का कर दूसरे क्रेता को सामान
बेचने वाले व्यापारी से भी न केवल सामान के मूल्य का दुगुना वसूल करना
चाहिए, अपितु राजा को उसे दण्डित भी करना चाहिए।
दीयमानं न गृह्णाति क्रीतं पण्यं च यः क्रयी।
विक्रीणानस्तदन्यत्र विक्रेता नापराध्नुयात् ॥ 9 ॥
हां, यदि क्रेता ख़रीदे पण्य को नहीं उठाता है, तो विक्रेता को अपना सामान
किसी अन्य व्यापारी को बेचने पर कोई दोष नहीं लगता; क्योंकि आख़िर व्यापारी
को अपना सामान बेचना ही तो है, घर में तो नहीं रखना है।
दत्तमूल्यस्य पण्यस्य विधिरेवं प्रकीर्तितः।
अदत्तेऽन्यत्र समयान्न विक्रेतुरतिक्रमः ॥ 10 ॥
उपर्युक्त सभी तथ्य-सामान को समय पर न देने का दण्ड, सामान के नष्ट
होने का दायित्व तथा सौदे से मुकरने का दोष आदि-उस स्थिति में लागू होते हैं,
जब क्रेता ने सामान का मूल्य चुकता कर दिया हो। यदि क्रेता ने मूल्य का भुगतान
ही नहीं किया, तो विक्रेता को उस सौदे से बांधा नहीं जा सकता। वह किसी भी
दूसरे को अपना सामान बेचने को स्वतन्त्र है; क्योंकि भुगतान न करने पर क्रेता पर
निर्भर कैसे किया जा सकता है ? हां, अपवाद-रूप में विक्रेता का क्रेता पर विश्वास
अडिग है, तो स्थिति भिन्न हो जाती है।
लाभार्थं वणिजां सर्वं पण्येषु क्रयविक्रयः।
स च लाभोऽर्थमासाद्य महान् भवति वा न वा ॥ 11 ॥
व्यापारी लोग लाभ कमाने के लिए ही पण्य का क्रय-विक्रय करते हैं और
यह लाभ पण्य-पदार्थों के मूल्य के घटने-बढ़ने के अनुरूप न्यूनाधिक होता रहता है।
तस्माद्देशे च काले च वणिगर्थं समाश्रयेत्।
न जिह्मं च प्रवर्त्तेत श्रेयानेवं वणिक्पथः ॥ 12 ॥
अतः व्यापारी देश और काल के आधार पर ही पण्य-पदार्थों का मूल्य
निर्धारित करते हैं। उदाहरणार्थ, ठण्डे इलाकों में विशेषतः शीत ऋतु में उष्ण पदार्थों
तथा लकड़ी-कोयला आदि की मांग बढ़ जाने से उनका मूल्य चढ़ जाता है। इसके
विपरीत मैदानी इलाक़ों में इनकी मांग और खपत कम होने से इनका मूल्य कम
रखा जाता है। व्यापार का श्रेष्ठ आचरण यह है कि मूल्यनिर्धारण में छल-कपट न
करके व्यावहारिकता को अपनाया जाये। ईमानदारी व सरलता को अपनाने वाला
व्यापारी ही धन तथा यश कमाता है।
॥ चतुर्थ अध्याय का अष्टम प्रकरण समाप्त ॥
नारदस्मृति / 179