नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
by देवर्षि नारद
Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)
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Read in contextसामान बेचकर, अर्थात् सौदा पक्का करके क्रेता को तत्काल सामान न सौंपने
वाले विक्रेता से, क्रेता द्वारा चुकाये गये मूल्य के साथ उस अवधि में चल वस्तु—
वस्त्र, आभूषण-आदि की स्थिति-रूप, रंग, चमक-दमक आदि में आये परिवर्तन
तथा बाज़ार में उसके मूल्य में आयी कमी आदि-के अनुरूप अर्थदण्ड वसूल
करना चाहिए तथा अचल सम्पत्ति के उपभोग से विक्रेता द्वारा प्राप्त सुविधा का
मूल्य क्रेता को दिलाना चाहिए।
अर्थश्चेदपचीयेत सोदयं पण्यमावहेत्।
स्थायिनामेष नियमो दिग्लाभो दिग्विचारिणाम् ॥ 5 ॥
सामान बेचने का सौदा पक्का करके विक्रेता पूरा सामान तत्काल न देकर
कालान्तर में (सारा अथवा कुछ) देने को कहता है और इस अवधि-सामान का
मूल्य निश्चित करने और सामान देने के मध्य के समय-में, यदि सामान का भाव
गिर जाता है और क्रेता की लाभ की सम्भावना धूमिल हो जाती है, तो उसकी
क्षतिपूर्ति का दायित्व विक्रेता पर है, यदि विक्रेता ने तत्काल सामान की आपूर्ति कर
दी होती, तो क्रेता उस समय के बाज़ार-भाव पर सामान बेचकर लाभ कमा सकता
था। विक्रेता द्वारा माल न देने से, अब क्रेता को हानि उठानी पड़ेगी। अतः क्रेता की
हानि का उत्तरदायी विक्रेता ही है।
उपर्युक्त व्यवस्था स्थायी क्रेता के लिए है। देश-देशान्तर में घूमने-फिरने
वाले और विभिन्न स्थानों से अपनी सुविधा से क्रय-विक्रय करने वाले अस्थायी
ग्राहकों पर विभिन्न देशों में प्रचलित नियम लागू होता है अथवा आपस में निश्चित
व्यवस्था ही लागू होती है, अर्थात् क्रेता-विक्रेता में जो शर्तें निश्चित हो जाती हैं,
उन्हीं का पालन किया जाता है।
उपहन्येत वा द्रव्यं दह्येतापह्रियेत् वा।
विक्रेतुरेव सोऽनर्थो विक्रीयासम्प्रयच्छतः॥ 6 ॥
सामान को बेचने का सौदा पक्का करके क्रेता को सामान न देने वाले विक्रेता
के सामान के चोरी हो जाने पर, गल जाने पर, सड़ जाने पर, नष्ट हो जाने पर, आग
लग जाने पर तथा राजा द्वारा अधिग्रहण कर लिये जाने पर सब प्रकार की हानि
विक्रेता की होती है, क्रेता को उस हानि से कुछ लेना-देना नहीं होता; क्योंकि
समय पर क्रेता को सामान न देने का दोषी विक्रेता ही है।
निर्दोषं दर्शयित्वा तु सदोषं यः प्रयच्छति।
मूल्यं तु द्विगुणं दाप्यो विनयं तावदेव च ॥ 7 ॥
उत्तम स्तर का सामान दिखाकर निकृष्ट स्तर का माल बेचने वाले व्यापारी से
न केवल चुकाये गये दाम का दुगुना वसूल करना चाहिए, अपितु उसे राजदण्ड
द्वारा अनुशासित भी करना चाहिए।
178 / नारदस्मृति