नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
by देवर्षि नारद
Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)
DevanagariSanskritpublished304 pages
Page 171 of 304
Read in contextPage 171
- परिभाषित-अपरिभाषित वेतन विधि
भृत्यानां वेतनस्योक्तो दानादानविधिक्रमः ।
वेतनस्यानपाकर्म तद्विवादपदं स्मृतम् ॥ 1 ॥
आजीविका के लिए सेवाकार्य करने वाले कर्मचारियों-अधिकारियों के वेतन
के भुगतान का नाम भी विधि है और इस भुगतान को रोकना, नकारना तथा टालना
आदि विवाद का विषय है।
भृत्याय वेतनं दद्यात् कर्मस्वामी यथाक्रमम् ।
आदौ मध्येऽवसाने वा कर्मणो यद्विनिश्चितम् ॥ 2 ॥
सेवाकार्य के भुगतान के अनेक रूप हैं- 1. पूरी निर्धारित राशि प्रारम्भ में ही
दे देना, 2. निर्धारित पारिश्रमिक का कुछ अंश प्रारम्भ में, कुछ मध्य में और कुछ
कार्य-समाप्ति पर देना, 3. सारा भुगतान कार्य-समाप्ति पर करना तथा 4. कुछ
पारिश्रमिक आधा कार्य हो जाने पर और कुछ पूरा कार्य निपट जाने पर देना।
ये सभी रूप प्रचलित हैं। जिसे जो अनुकूल लगता हो, उसे वही अपनाना
चाहिए।
भृत्यावनिश्चितायां तु दशभागं समाप्नुयुः ।
लाभगोबीजशस्यानां वणिग्गोपकृषीवलाः ॥ 3 ॥
वेतन अथवा पारिश्रमिक निर्धारित किये बिना ही कार्य पर लगाये गये भृत्य
को व्यापारी द्वारा अपने लाभ का, गोपाल द्वारा अपने दुग्ध, दधि तथा नवनीत आदि
गव्य द्रव्यों का तथा कृषक द्वारा अपनी उपज - फल, सब्जी तथा धान्य आदि - का
दशम भाग देय होता है।
क्रियोपकरणं चैषां क्रियां मत्प्रत्युदाहृतम् ।
तत्स्वभावेन कुर्वीत न जिह्येन समाचरेत् ॥ 4 ॥
तकनीकी कर्मचारियों को काम में आने वाले उपकरणों (ट्रेक्टर आदि मशीनें)
का ईमानदारी और सही ढंग से प्रयोग करना चाहिए। इसमें कुटिलता बरतनी धूर्तता
ही नहीं, पाप भी है। किसी यन्त्र को जान-बूझकर ख़राब कर देना, बिगड़े और
ठीक हो सकने वाले यन्त्र को ठीक न करना तथा ठीक करने में अनुचित ख़र्च
कराना, अपने व्यवसाय के साथ विश्वासघात करना है। कर्मचारी को अपनी
सत्यनिष्ठा से अपने स्वामी का विश्वास जीतना चाहिए।
नारदस्मृति / 169