नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
by देवर्षि नारद
Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)
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Read in contextदास बनाकर नहीं रखा जा सकता।
वर्णानां प्रातिलोम्येन दासत्वं न विधीयते।
स्वधर्म त्यागिनोऽन्यत्र दारवद्दासता मता ॥ ३९॥
जिस प्रकार निम्न वर्ण वाले पुरुष को उत्तम वर्ण की स्त्री से विवाह सम्बन्ध
का अधिकार नहीं है (उत्तम वर्ण की ब्राह्मण स्त्री निम्न वर्ण के शूद्र पुरुष से सम्बन्ध
जोड़ती है, तो उसे अपनी जाति से बहिष्कृत कर दिया जाता है) उसी प्रकार उच्च
वर्ण के व्यक्ति को निम्न वर्ण के व्यक्ति द्वारा दास नहीं बनाया जा सकता। शूद्र तथा
वैश्य द्वारा ब्राह्मण व क्षत्रिय से दास के रूप में काम लेना वर्जित है।
तवाहमिति चात्मानं योऽस्वतन्त्रः प्रयच्छति।
न स तं प्राप्नुयात् नाम पूर्वस्वामी लभेत तम्॥ ४० ॥
पहले से ही किसी के अधीन व्यक्ति (दूसरे के दास) द्वारा किसी अन्य
व्यक्ति का दासत्व स्वीकार करने को मान्य नहीं किया जा सकता, अर्थात् दास को
अपने पूर्व स्वामी को छोड़ने का और नया स्वामी चुनने का कोई अधिकार नहीं है।
पुराना स्वामी अपने दास के नये स्वामी के पास होने का पता चलने पर, उसे
बलपूर्वक वहां से अपने पास वापस ले जा सकता है।
अधनास्त्रय एवोक्ताः भार्या दासस्तथा सुतः।
यत्तु समधिगच्छन्ति यस्य ते तस्य तद्धनम् ॥ ४१॥
तीनों—स्त्री, पुत्र और दास—को निजी धन रखने का कोई अधिकार नहीं,
अतः इनके द्वारा किया गया व्यापार-धन्धा तथा उससे अर्जित लाभ उसी का होता
है, जिसके ये होते हैं, अर्थात् स्त्री, पुत्र और दास की सम्पत्ति पर क्रमशः पति, पिता
और स्वामी का अधिकार होता है।
स्वदासमिच्छेद् यः कर्तुमदासं प्रीतमानसः।
स्कन्धादादाय तस्यासौ भिद्यात् कुम्भ सहाम्भसा ॥ ४२ ॥
साक्षताभिः सपुष्पाभिर्मूर्ध्न्यद्भिरवाकिरेत्।
अदास इति चोक्त्वा त्रिः प्राङ्मुखं तमथोत्सृजेत् ॥ ४३ ॥
अपनी प्रसन्नता एवं उदारता से दास को दासत्व से मुक्त करने के इच्छुक
स्वामी को जल से पूर्ण कलश दास के कन्धे से गिरा फोड़कर ऐसी घोषणा करनी
चाहिए। इसके साथ अक्षत और पुष्प युक्त जल को दास के मस्तक से छुआकर
गिराते हुए तीन बार बोलना चाहिए—अब तुम दास नहीं हो। इसके उपरान्त दासता
से मुक्त हुए पुरुष को तत्काल पूर्व दिशा की ओर चल देना चाहिए।
॥ चतुर्थ अध्याय का पञ्चम प्रकरण समाप्त ॥
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