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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 158 of 304

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Page 158
  1. दत्ताप्रदानिकं प्रकरण
    दत्त्वा द्रव्यमसम्प्यग् यः पुनरादातुमिच्छति।
    दत्ताप्रदानिकं नाम तद्विवादपदं स्मृतम्॥ 1 ॥
    किसी अयोग्य व्यक्ति को योग्य समझकर दिये गये धन को उसकी अयोग्यता
    एवं अपात्रता के प्रकट हो जाने पर क्रोधावेश में वापस लेने का प्रयास 'दत्ताप्रदानिक'
    कहलाता है। इसे भी एक विवाद स्थल समझना चाहिए।
    अदेयमथ देयं च दत्तं चादत्तमेव च।
    व्यवहारेषु विज्ञेयो दानमार्गश्चतुर्विधः॥ 2 ॥
    देना चार प्रकार होता है-अदेय, देय, दत्त और अदत्त। निषिद्ध वस्तु का देना
    अदेय, देने योग्य वस्तु का दान देय, देकर पुनः न लौटाना दत्त तथा एक बार देकर
    वापस मिल गया अदत्त कहलाता है।
    तत्रेहाष्टावदेयानि देयमेकविधं स्मृतम्।
    दत्तं सप्तविधं ज्ञेयमदत्तं षोडशात्मकम्॥ 3 ॥
    स्मृतिकारों ने अदेय के आठ, देय का एक, दत्त के सात और अदत्त के सोलह
    प्रकार बताये हैं।
    अन्वाहितं याचितकमाधिः साधारणं च यत्।
    निक्षेपः पुत्रदारं च सर्वस्वं चान्वये सति॥ 4 ॥
    परिवार रखने वाले, अर्थात् गृहस्थ के लिए अदेय होते हैं-1. अन्वाहिता-
    कठिनाई से जुटाया गया धन, 2. याचित, 3. आधि-धरोहर की वस्तु, 4. साधारण
    द्रव्य-खाने-पीने के काम में आने वाला, 5.निक्षेप, 6. स्त्री, 7. पुत्र तथा 8. सर्वस्व
    -घर के बरतन, वस्त्र आदि।
    आपत्स्वपि हि कृष्ट्रासु वर्त्तमानेन देहिना।
    अदेयान्याह्राचार्या यच्चान्यस्मै प्रतिश्रुतम्॥ 5 ॥
    आचार्यों के अनुसार उपर्युक्त आठ प्रकार के धन घोर संकट के उपस्थित होने
    पर तथा देने का वचन देकर भी कभी नहीं देने चाहिए।
    कुटुम्बभरणाद् द्रव्यं यत्किञ्चिदतिरिच्यते।
    तद्देयमपहृत्यान्यत् कुटुम्बी दोषमाप्नुयात्॥ 6 ॥
    परिवार का भरण पोषण करना परिवार के मुखिया का कर्तव्य कर्म है।
    156 / नारदस्मृति