नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
by देवर्षि नारद
Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)
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Read in contextउसके उत्तराधिकारी के उस देश में पहुंचने तक व्यापारी के माल की सुरक्षा का
दायित्व उस देश के राजा का होता है।
दायादेऽसति बन्धुभ्यो जातिभ्यो वा समर्पयेत्।
तदभावे सुगुप्तं तद्धारयेद्दशतीः समाः ॥ 17 ॥
मृत व्यापारी के पुत्र के न आने पर मृतक का सामान उसके भागीदारों, जाति-
बन्धुओं अथवा अधिकार सिद्ध करने वाले इष्टमित्रों को सौंपना चाहिए। मृतक के
किसी भी उत्तराधिकारी द्वारा उसके सामान को लेने के लिए न आने पर राजा को
दस वर्षों तक सामान को सुरक्षित रखने का दायित्व निभाना चाहिए।
अस्वामिकमदायादं दशवर्षस्थितं ततः।
राजा तदात्मसात् कुर्यादेवं धर्मो न हीयते ॥ 18 ॥
यदि मृतक के सामान का कोई भी दावेदार दस वर्षों के भीतर आकर अपना
दावा प्रस्तुत नहीं करता, तो राजा को यह मान लेना चाहिए कि मृतक का कोई
उत्तराधिकारी नहीं है। इस स्थिति में प्रशासन को वह सामान बेचकर प्राप्त धन
राजकोष में जमा करा देना चाहिए।
दस वर्षों के पश्चात् किसी दावेदार के आ जाने पर उस धन को लौटाना-न
लौटाना राजा की इच्छा पर निर्भर करता है। निर्धारित अवधि के उपरान्त दावेदार
केवल दया की याचना ही कर सकता है; क्योंकि समय-सीमा के बीत जाने के
साथ उसका विधिसम्मत अधिकार भी समाप्त हो चुका होता है।
॥ चतुर्थ अध्याय का तृतीय प्रकरण समाप्त ॥
नारदस्मृति / 155