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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 143 of 304

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Page 143

वर्षा ऋतु में छह यव, ग्रीष्म ऋतु में पांच यव और हेमन्त ऋतु में सात अथवा
आठ यव परिमाण जितने विष का सेवन कराना चाहिए, शरद् ऋतु में विष का
सेवन सर्वथा वर्जित है।
त्वं विषं ब्रह्मणः पुत्रः सत्यधर्मव्यवस्थितः।
शोधयेत्तं नरं पापात् सत्येनास्यामृतो भव॥ 325 ॥
विष सेवन कराने से पूर्व विष को हाथ में लेकर इस प्रकार प्रार्थना करनी
चाहिए—हे विष! आप ब्रह्माजी की सन्तान होने से सत्स्वरूप हैं। धर्म और सत्य
की व्यवस्था का भार आपके सिर पर है। अमुक अभियुक्त आपकी शरण में आया
है, आप उसके लिए अमृत बनकर उसकी सत्यता को प्रकाशित करके व उसकी
निष्पापता को सार्वजनिक करके उसे कृतकृत्य कर दें।
छायानिवेशितो रक्ष्यो दिनशेषमभोजनः।
विषवेगकलमातीतः शुद्धोऽसौ मनुरब्रवीत् ॥ 326 ॥
मनु महाराज के अनुसार विष सेवन करने वाले अभियुक्त को दिन के समय
एक तो शीतल स्थान पर—वृक्ष की छाया, भवन के भीतर—रखना चाहिए तथा
दूसरे, उसे खाने के लिए कुछ नहीं देना चाहिए, अर्थात् उपवास कराना चाहिए।
विष के प्रभाव से अभियुक्त के मुख की कान्ति के मलिन न पड़ने, अर्थात् पूर्ववत्
तेजोमय बने रहने तथा व्यक्ति के स्वास्थ्य में विकार न आने, अर्थात् पूर्ववत् स्फूर्त
बने रहने पर उसे शुद्ध एवं निर्दोष प्रमाणित मानना चाहिए।
अतः परं प्रवक्ष्यामि कोशस्य विधिमुत्तमम्।
शास्त्रविद्भिर्र्यथा प्रोक्तं सर्वकालाविरोधि यत्॥ 327 ॥
अब हम सर्वोत्तम दिव्य कोश की विधि का वर्णन करेंगे। यहां इतना समझना
चाहिए कि सभी देशों और कालों के सभी आचार्यों ने इस विधि को एकमत से
सर्वश्रेष्ठ दिव्य घोषित किया है। इसका प्रयोग सर्वत्र समान रूप से मान्य एवं
प्रचलित है।
पूर्वाह्ने सोपवासस्य स्नातस्यार्द्रपटस्य च।
सशूकस्याव्यसनिनः कोशपानं विधीयते॥ 328 ॥
उल्लेखनीय यह है कि इस दिव्य का अधिकार केवल आस्तिक और व्यसनमुक्त
व्यक्ति को है। वेदों और ईश्वर पर आस्था न रखने वाले तथा किसी दुर्व्यसन का
शिकार बने व्यक्ति को तो इस दिव्य के सम्बन्ध में सोचना ही नहीं चाहिए।
यद्भक्तः सोऽभियुक्तः स्यात्तद्दैवतं तु पापयेत्।
अभ्यर्च्य देवतां स्नाप्य जलस्य प्रसृतित्रयम्॥ 329 ॥
किसी भक्त के अभियुक्त होने पर उसके स्नान-ध्यान आदि से निवृत्त होने पर
उसे उसके आराध्य देव का पाद्य अर्घ्य तथा आचमनीय आदि के उपरान्त धूप
नारदस्मृति / 141