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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 142 of 304

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Page 142

विष दिव्य के अन्तर्गत धर्मशास्त्रियों ने विष के जितने परिमाण के सेवन का
उल्लेख किया है, हेमन्त ऋतु में विष का उतना वज़न तुला में तोलकर रख देना
चाहिए और शरद ऋतु के आने पर उसका उपयोग करना चाहिए।
नापराह्ने न सन्ध्यायां न मध्याह्ने तु धर्मवित्।
शरदग्रीष्मवसन्तेषु वर्षासु च विवर्जयेत् ॥ ३२०॥
धर्मशास्त्रियों के मतानुसार विष दिव्य के प्रयोग के उपयुक्त समय हैं—
अपराह्न, सन्ध्याकाल, मध्याह्न, शरद ऋतु, ग्रीष्म ऋतु, वसन्त ऋतु तथा वर्षा ऋतु।
अभिप्राय यह है कि शरद, वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा ऋतुओं में मध्याह्न,
अपराह्न तथा सन्ध्याकाल में विष दिव्य का प्रयोग करना उचित है।
भग्नं च चारितं चैव धूपितं मिश्रितं तथा।
कालकूटमलाबुं च विषं यत्नेन वर्जयेत् ॥ ३२१॥
सभी शास्त्रकारों ने एक मत से तिल-घी से चुपड़े-लिथड़े, गरम-तप्त किसी
सुगन्धित पदार्थ में मिले घुले तथा कालकूट और अलाबु से बनने वाले विष के
प्रयोग का निषेध किया है। वस्तुतः ऐसे विष व्यक्ति के शरीर पर घाव, खुजली,
पीड़ा आदि के अतिरिक्त चमड़ी को झुलसाने वाले होते हैं। मानवीय आधार पर भी
इनका प्रयोग सर्वथा अवाञ्छनीय होता है।
शार्ङ्गं हैमवतं शस्तं वर्णगन्धरसान्वितम्।
अभिन्नं तत् . प्रदातव्यं क्षत्रविट्शूद्रयोनिषु ॥ ३२२॥
उत्तम वर्ण, गन्ध व रस वाला विष हिमालय के शृंग (शिखर) पर उत्पन्न
होता है, जो 'शार्ङ्ग' नाम से जाना जाता है। यह प्राकृतिक विष है, इसमें किसी
प्रकार की कोई कृत्रिमता नहीं है। क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के अभियुक्त-अभिशस्त
होने पर उन्हें विष दिव्य के अन्तर्गत इसी प्राकृतिक विष का सेवन कराना चाहिए।
विषस्य पलषड्भागाद्भागो विंशतिमस्तु यः।
तमष्टभागहीनं तु शोध्ये दद्यात् घृतप्लुतम् ॥ ३२३ ॥
विष दिव्य के अन्तर्गत कितने वज़न में और किस रूप में विष देना चाहिए—
इस सम्बन्ध में आचार्यों का मत है कि सात जौ के परिमाण भर विष ही पर्याप्त है।
इसे शास्त्रीय भाषा में इस प्रकार कहा गया है—एक सौ साठ यवों का एक पल
होता है। इस पल के छठे भाग लगभग 27 यवों में से बीस यव निकाल देने
चाहिए। अब बचे सात यवों में से भी आठवां भाग निकाल देना चाहिए, इस प्रकार
6 7 यवों के भार बराबर विष में घी मिलाकर सेवन कराना चाहिए। रूखा विष
कभी नहीं देना चाहिए।
वर्षासु षड्यवा मात्रा ग्रीष्मे पञ्च यवाः स्मृताः।
हेमन्ते सप्त चाष्टौ वा शरद्यस्यापि नेष्यते ॥ ३२४॥
140 / नारदस्मृति