Skip to content
SarvaKosh
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 90 of 770

Read in context
Page 90

८८ * संक्षिप्त नारदपुराण *


भोजन करे। इस प्रकार जो भक्ति-भावसे भगवान् केशवकी उत्तम पूजा करता है, वह आठ पौण्डरीक यज्ञके समान फल पाता है। पौष मासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिको उपवास करके ‘नमो नारायणाय’ इस मन्त्रसे पवित्रतापूर्वक श्रीहरिका पूजन करे। दूधसे भगवान्‌को नहलाकर खीरका नैवेद्य अर्पण करे। रातमें तीनों समय श्रीहरिकी पूजामें संलग्न रहकर जागता रहे। गन्ध, मनोरम पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, नृत्य, गीत-वाद्य आदि तथा स्तोत्रोंद्वारा श्रीहरिकी अर्चना करे। सबेरेकी पूजाके पश्चात् घृत और दक्षिणासहित खिचड़ी ब्राह्मणको दे। (उस समय निम्नाङ्कित मन्त्र पढ़ना चाहिये—)

सर्वात्मा सर्वलोकेशः सर्वव्यापी सनातनः।
नारायणः प्रसन्नः स्यात् कृशरान्नप्रदानतः॥
(ना० पूर्व० १७। २८)

‘जो सबके आत्मा, सम्पूर्ण लोकोंके ईश्वर तथा सर्वत्र व्यापक हैं, वे सनातन भगवान् श्रीनारायण यह खिचड़ी दान करनेसे मुझपर प्रसन्न हों।’

इस मन्त्रसे ब्राह्मणको उत्तम दान देकर यथाशक्ति ब्राह्मणोंको भोजन करावे। फिर स्वयं बन्धु-बान्धवोंसहित भोजन करे। जो इस प्रकार भक्तिपूर्वक भगवान् नारायणदेवका पूजन करता है, वह आठ अग्निष्टोम यज्ञोंका सम्पूर्ण फल प्राप्त कर लेता है। माघ शुक्ला द्वादशीको भी पूर्ववत् उपवास करके ‘नमस्ते माधवाय’ इस मन्त्रसे अग्निमें आठ बार घीकी आहुति दे। उस दिन पूर्ववत् सेरभर दूधसे भगवान् माधवको स्नान करावे। फिर चित्तको एकाग्र करके गन्ध, पुष्प और अक्षत आदिसे पहलेकी तरह तीनों समय भक्तिपूर्वक पूजन करते हुए रातमें जागरण करे। तत्पश्चात् प्रातःकालका कृत्य समाप्त करके पुनः श्रीमाधवकी अर्चना करे। अन्तमें सब पापोंसे छुटकारा पानेके लिये वस्त्र और दक्षिणासहित सेरभर तिल ब्राह्मणको इस मन्त्रसे दान करे—

माधवः सर्वभूतात्मा सर्वकर्मफलप्रदः।
तिलदानेन महता सर्वान् कामान् प्रयच्छतु॥
(ना० पूर्व० १७। ३५)

‘सम्पूर्ण कर्मोंका फल देनेवाले तथा समस्त भूतोंके आत्मा भगवान् लक्ष्मीपति तिलके इस महादानसे प्रसन्न होकर मेरी सब कामनाएँ पूरी करें।’

इस मन्त्रसे भक्तिपूर्वक ब्राह्मणको तिल दान देकर भगवान् माधवका स्मरण करते हुए यथाशक्ति ब्राह्मणोंको भोजन कराये। मुने! जो इस प्रकार भक्ति-भावसे तिलदानयुक्त व्रत करता है, वह सौ वाजपेय यज्ञके सम्पूर्ण फलको प्राप्त कर लेता है। फाल्गुनके शुक्लपक्षमें द्वादशीको उपवास करके व्रती पुरुष ‘गोविन्दाय नमस्तुभ्यम्’ इस मन्त्रसे भगवान्‌का पूजन करे और घृतमिश्रित तिलकी एक सौ आठ आहुति देकर पूर्वोक्त मानके अनुसार एक सेर दूधसे पवित्रतापूर्वक भगवान् गोविन्दको स्नान करावे। पूर्ववत् रातमें जागरण