Skip to content
SarvaKosh
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 89 of 770

Read in context
Page 89
  • पूर्वभाग-प्रथम पाद * | ८७
    ---|---

मार्गशीर्ष माससे लेकर कार्तिक मासपर्यन्त उद्यापनसहित शुक्लपक्षके द्वादशीव्रतका वर्णन

ऋषि बोले— महाभाग सूतजी! आपको साधुवाद है। आपका हृदय अत्यन्त दयालु है। आपने कृपा करके सब पापोंका नाश करनेवाला उत्तम गङ्गा-माहात्म्य हमें सुनाया है। यह गङ्गा-माहात्म्य सुनकर देवर्षि नारदजीने मुनिश्रेष्ठ सनकजीसे कौन-सा प्रश्न किया? यह बताइये।

सूतजीने कहा— आप सब ऋषि सुनें। देवर्षि नारदने फिर जिस प्रकार प्रश्न किया था, वह बतलाऊँगा।

नारदजी बोले— मुने! आप भगवान् विष्णुके उन व्रतोंका वर्णन कीजिये, जिनका अनुष्ठान करनेसे भगवान् प्रसन्न होते हैं। जो भगवत्-सम्बन्धी व्रत, पूजन और ध्यानमें तत्पर हो भगवान्‌का भजन करते हैं, उनको भगवान् विष्णु मुक्ति तो अनायास ही दे देते हैं, पर वे जल्दी किसीको भक्तियोग नहीं देते। मुनिश्रेष्ठ! आप भगवान् विष्णुके भक्त हैं। प्रवृत्तिमार्ग और निवृत्तिमार्ग-सम्बन्धी जो कर्म भगवान् श्रीहरिको प्रसन्न करनेवाला हो, उसका मुझसे वर्णन कीजिये।

श्रीसनकजीने कहा— मुनिश्रेष्ठ! बहुत अच्छा, बहुत अच्छा। तुम भगवान् पुरुषोत्तमके भक्त हो, इसीलिये बार-बार उन शार्ङ्गधन्वा-श्रीहरिका चरित्र पूछते हो। मैं तुम्हें उन लोकोपकारी व्रतोंका उपदेश करता हूँ, जिनसे भगवान् श्रीहरि प्रसन्न होते हैं और साधकको अभय-दान देते हैं। जिस पुरुषपर यज्ञस्वरूप भगवान् जनार्दनकी प्रसन्नता हो जाती है, उसे इहलोक और परलोकमें सुख मिलता है तथा उसके तपकी वृद्धि होती है। महर्षिगण कहते हैं कि जिस किसी उपायद्वारा भी जो लोग भगवान् विष्णुकी आराधनामें लगे रहते हैं, वे परम पदको प्राप्त होते हैं। मार्गशीर्ष मासमें शुक्लपक्षकी द्वादशीको उपवास करके मनुष्य श्रद्धापूर्वक जलशायी भगवान् नारायणकी पूजा करे। मुनिश्रेष्ठ! पहले दन्तधावन करके स्नान करे, फिर श्वेतवस्त्र धारण करके मौन हो गन्ध, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप और नैवेद्य आदि उपचारोंद्वारा भक्ति-भावसे श्रीहरिका पूजन करना चाहिये। 'केशवाय नमस्तुभ्यम्' (केशव! आपको नमस्कार है।)—इस मन्त्रद्वारा श्रीविष्णुकी पूजा करनी चाहिये। उसी मन्त्रसे प्रज्वलित अग्निमें घृतमिश्रित तिलकी एक सौ आठ आहुति देकर भगवान् शालग्रामके समीप रातमें जागरण करे। उस रात्रिमें ही सेरभर दूधसे रोग-शोकरहित भगवान् श्रीनारायणको स्नान करावे और गीत-वाद्य, नैवेद्य, भक्ष्य तथा भोज्य पदार्थोंद्वारा महालक्ष्मीसहित उन भगवान् नारायणका भक्तिपूर्वक तीन समय पूजन करे। फिर सबेरे उठकर यथावश्यक शौच-स्नानादि कर्म करके पूर्ववत् मन-इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए मौनभावसे पवित्रतापूर्वक भगवान्‌की पूजा करे। उसके बाद निम्नाङ्कित मन्त्रसे दक्षिणासहित घृतमिश्रित खीर और नारियलका फल भक्तिपूर्वक ब्राह्मणको अर्पित करे—

केशवः केशिहा देवः सर्वसम्पत्प्रदायकः ॥
परमान्नप्रदानेन मम स्यादिष्टदायकः।
(ना० पूर्व० १७। २१-२२)

‘जिन्होंने केशी दैत्यको मारा है तथा जो सब प्रकारकी सम्पत्ति देनेवाले हैं, वे भगवान् केशव यह उत्तम अन्न दान करनेसे मेरे लिये अभीष्ट वस्तुको देनेवाले हों।’

तदनन्तर अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणभोजन करावे। उसके बाद भगवान् नारायणका चिन्तन करते हुए मौन होकर स्वयं भी भाई-बन्धुओंसहित