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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 83 of 770

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Page 83
* पूर्वभाग-प्रथम पाद *८१

राजा भगीरथका भृगुजीके आश्रमपर जाकर सत्सङ्ग-लाभ करना तथा हिमालयपर घोर तपस्या करके भगवान् विष्णु और शिवकी कृपासे गङ्गाजीको लाकर पितरोंका उद्धार करना

**नारदजीने पूछा—**मुने! हिमालय पर्वतपर जाकर राजा भगीरथने क्या किया? वे गङ्गाजीको किस प्रकार ले आये? यह मुझे बतानेकी कृपा करें।

**श्रीसनकजीने कहा—**मुने! महाराज भगीरथ जटा और चीर धारण करके तपस्याके लिये हिमालयपर जाते हुए गोदावरी नदीके तटपर पहुँचे*। वहाँ उन्होंने महान् वनमें महर्षि भृगुका उत्तम आश्रम देखा, जो कृष्णसार मृगोंसे भरा हुआ था और चमरी गायोंका समुदाय अपनी पूँछ हिलाकर मानो उस आश्रमको चँवर डुला रहा था। मालती, जूही, कुन्द, चम्पा और अश्वत्थ—उस आश्रमको विभूषित कर रहे थे। वहाँ चारों ओर भाँति-भाँतिके फूल खिले हुए थे। ऋषि-मुनियोंका समुदाय वहाँ निवास करता था। वेदों और शास्त्रोंका महान् घोष आकाशमें गूँज रहा था। महर्षि भृगुके ऐसे आश्रममें राजा भगीरथने प्रवेश किया। भृगुजी परब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन कर रहे थे। शिष्योंकी मण्डली उन्हें घेरकर बैठी थी। तेजमें वे भगवान् सूर्यके समान थे। राजा भगीरथने वहाँ उनका दर्शन किया और उनके चरण-ग्रहण आदि विधिसे उन ब्राह्मणशिरोमणिकी वन्दना की; साथ ही भृगुजीने भी सम्मानपूर्वक राजाका आतिथ्य-सत्कार किया। महर्षि भृगुके द्वारा आतिथ्य-सत्कार हो जानेपर राजा भगीरथ उन मुनीश्वरसे हाथ जोड़कर विनयपूर्वक बोले।

**भगीरथने कहा—**भगवन्! आप सब धर्मोंके ज्ञाता तथा सम्पूर्ण शास्त्रोंके विद्वान् हैं। मैं संसार-बन्धनके भयसे डरकर आपसे मनुष्योंके उद्धारका उपाय पूछता हूँ। सर्वज्ञ मुनिसत्तम! यदि मैं आपका कृपापात्र होऊँ तो जिस कर्मसे भगवान् संतुष्ट होते हैं, वह मुझे बताइये।

**भृगुने कहा—**राजन्! तुम्हारी अभिलाषा क्या है, यह मुझे मालूम हो गयी। तुम पुण्यात्माओंमें श्रेष्ठ हो। अन्यथा अपने समस्त कुलका उद्धार करनेकी योग्यता तुममें कैसे आती? भूपाल! जो कोई भी क्यों न हो, यदि वह शुभ कर्मके द्वारा अपने कुलके उद्धारकी इच्छा रखता है तो उसे नररूपमें साक्षात् नारायण ही समझना चाहिये। राजेन्द्र! जिस कर्मसे प्रसन्न होकर देवेश्वर भगवान् विष्णु मनुष्योंको अभीष्ट फल प्रदान करते हैं, वह


* इस प्रसंगको देखनेसे यह जान पड़ता है कि उन दिनों राजा भगीरथ दक्षिण भारतमें गोदावरीसे भी कुछ दूर दक्षिणके किसी स्थानमें रहा करते थे। तभी उनके मार्गमें गोदावरी नदी आ सकी। सूर्यवंशियोंकी सुप्रसिद्ध राजधानी अयोध्यासे हिमालय जानेमें तो गोदावरीका मार्गमें आना सम्भव नहीं है।