संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context८० * संक्षिप्त नारदपुराण *
सात्त्विकी भक्ति सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फल देनेवाली है। इसलिये भूपाल! सुनो—संसारको जीतनेकी इच्छावाले उपासकको अपने कर्मका त्याग न करते हुए भगवान् जनार्दनकी भक्ति करनी चाहिये। जो स्वधर्मका परित्याग करके भक्तिमात्रसे जीवन धारण करता है, उसपर भगवान् विष्णु संतुष्ट नहीं होते। वे तो धर्माचरणसे संतुष्ट होते हैं। सम्पूर्ण आगमोंमें आचारको प्रथम स्थान दिया गया है। आचारसे धर्म प्रकट होता है और धर्मके स्वामी साक्षात् भगवान् विष्णु हैं*। इसलिये स्वधर्मका विरोध न करते हुए श्रीहरिकी भक्ति करनी चाहिये। सदाचारशून्य मनुष्योंके धर्म भी सुख देनेवाले नहीं होते। स्वधर्मपालनके बिना की हुई भक्ति भी नहीं की हुईके समान कही गयी है। राजन्! तुमने जो कुछ पूछा था, वह सब मैंने कह दिया। अतः तुम अपने धर्ममें तत्पर रहकर सूक्ष्म-से-सूक्ष्म स्वरूपवाले जनार्दनभगवान् नारायणका पूजन करो। इससे तुम्हें सनातन सुखकी प्राप्ति होगी। भगवान् शिव ही साक्षात् श्रीहरि हैं और श्रीहरि ही स्वयं शिव हैं। इन दोनोंमें भेद देखनेवाला दुष्ट पुरुष करोड़ों नरकोंमें जाता है। इसलिये भगवान् विष्णु और शिवको समान समझकर उनकी आराधना करो। इनमें भेददृष्टि करनेवाला मनुष्य इहलोक और परलोकमें भी दुःख पाता है।
जनेश्वर! मैं जिस कार्यके लिये तुम्हारे पास आया था, वह तुम्हें बतलाता हूँ। सुमते! सावधान होकर सुनो। राजन्! आत्महत्याका पाप करनेवाले तुम्हारे पितामहगण महात्मा कपिलके क्रोधसे दग्ध हो गये हैं और इस समय वे नरकमें निवास करते हैं। महाभाग! गङ्गाजीको लानेका पराक्रम करके तुम उनका उद्धार करो। भूपते! गङ्गाजी निश्चय ही सब पापोंका नाश कर देती हैं। नृपश्रेष्ठ! मनुष्यके केश, हड्डी, नख, दाँत तथा शरीरकी भस्म भी यदि गङ्गाजीके शरीरसे छू जायँ तो वे भगवान् विष्णुके धाममें पहुँचा देती हैं। राजन्! जिसकी हड्डी अथवा भस्मको मनुष्य गङ्गाजीमें डाल देते हैं, वह सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् श्रीहरिके धाममें चला जाता है। भूपते! अबतक जितने भी पाप तुम्हें बताये गये हैं, वे सब गङ्गाजीके एक बिन्दुका अभिषेक होनेसे नष्ट हो जाते हैं।
श्रीसनकजी कहते हैं—मुनिश्रेष्ठ नारद! धर्मात्मा महाराज भगीरथसे ऐसा कहकर धर्मराज तत्काल अन्तर्धान हो गये। तब सब शास्त्रोंके पारगामी महाबुद्धिमान् राजा भगीरथ सम्पूर्ण पृथ्वीका राज्य मन्त्रियोंको सौंपकर स्वयं वनको चले गये। वहाँसे हिमालयपर जाकर नर-नारायणके आश्रमसे पश्चिमकी तरफ बर्फसे ढके हुए एक शिखरपर, जो सोलह योजन विस्तृत है, उन्होंने तपस्या की और त्रिभुवनपावनी गङ्गाको वे इस भूतलपर ले आये।
महिमानं हरेर्यस्तु किंचिच्छ्रुत्वापि यो नरः। तन्मयत्वेन संतुष्टः सा भक्तिरुत्तमोत्तमा ॥
अहमेव परो विष्णुर्मयि सर्वमिदं जगत्। इति यः सततं पश्येत्तं विद्यादुत्तमोत्तमम् ॥
(ना० पूर्व० १५। १४०—१५०)
* सर्वागमानामाचारः प्रथमं परिकल्पते। आचारप्रभवो धर्मो धर्मस्य प्रभुरच्युतः ॥
(ना० पूर्व० १५। १५४)