संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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गङ्गा हैं। प्रयागमें प्रवेश करनेमात्रसे पापोंका तत्काल नाश हो जाता है। जो पवित्र है, वह मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर, हिंसासे दूर हो यदि श्रद्धापूर्वक स्नान करता है तो पापमुक्त होता और परम पदको प्राप्त करता है। नैमिष, पुष्कर, गोतीर्थ, सिन्धुसागरसंगम, गया, धेनुक और गङ्गासागरसंगम—ये तथा और भी जो बहुत-से पुण्यमय पर्वत हैं, वे सब मिलकर तीन करोड़ दस हजार तीर्थ प्रयागमें विद्यमान हैं। सूर्यपुत्री यमुनादेवी तीनों लोकोंमें विख्यात हैं। वे लोकपावनी यमुना प्रयागमें गङ्गासे मिली हैं। गङ्गा और यमुनाके बीचका भू-भाग पृथ्वीपर सर्वोत्तम माना गया है। सुन्दरी! तीनों लोकोंमें प्रयागसे बढ़कर परम पवित्र तीर्थ नहीं है। प्रयाग परम पद-स्वरूप है। उसका दर्शन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाते हैं।
अतः सम्पूर्ण देवताओंसे सुरक्षित प्रयागतीर्थमें जाकर जो ब्रह्मचर्यका पालन तथा देवता और पितरोंका तर्पण करते हुए एक मासतक वहाँ निवास करता है, वह जहाँ-कहीं भी रहकर सम्पूर्ण मनोवाञ्छित कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। गङ्गा और यमुनाका संगम सम्पूर्ण लोकोंमें विख्यात है। वहाँ शक्तिपूर्वक स्नान करनेसे जिसके-जिसके मनमें जो-जो कामना होती है। उसकी वह कामना अवश्य पूर्ण हो जाती है। हरिद्वार, प्रयाग और गङ्गासागरसंगममें स्नान करनेमात्रसे मनुष्य अपनी रुचिके अनुसार ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवके धाममें चला जाता है। सुलोचने! माघ मासमें सितासितसंगमके जलमें जो स्नान किया जाता है, वह सौ कोटि कल्पोंमें भी कभी पुनरावृत्तिका अवसर नहीं देता। जो सत्यवादी तथा क्रोधको जीतनेवाला है, जो उच्चकोटिकी अहिंसाका आश्रय ले चुका है, जो धर्मका अनुसरण करनेवाला, तत्त्वज्ञ, गौ-ब्राह्मणके हितमें तत्पर रहनेवाला है तथा गङ्गा-यमुनाके सङ्गममें स्नान करनेवाला है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।
वहाँ प्रतिष्ठानपुर (झूँसी)-में एक अत्यन्त विख्यात कूप है। वहाँ मनको संयममें रखकर स्नान करनेके पश्चात् देवताओं और पितरोंका तर्पण करे और ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए क्रोधको जीते। इस प्रकार जो तीन रात वहाँ निवास करता है, वह सब पापोंसे शुद्धचित्त हो अश्वमेध-यज्ञका फल पाता है। प्रतिष्ठानसे उत्तर और भागीरथीसे पूर्व 'हंस-प्रतपन' नामक लोकविख्यात तीर्थ है। वहाँ स्नान करनेमात्रसे अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है और जबतक चन्द्रमा और सूर्य रहते हैं, तबतक वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। तदनन्तर वासुकिनागसे उत्तर भोगवतीके पास जाकर दशाश्वमेधतीर्थ है। वह परम उत्तम माना गया है। वहाँ स्नान करके मनुष्य अश्वमेध-यज्ञका फल पाता है और इहलोकमें धनाढ्य, रूपवान्, दक्ष, दाता एवं धार्मिक होता है। चारों वेदोंका स्वाध्याय करनेवाले पुरुषोंको