Skip to content
SarvaKosh
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished770 pages

Page 711 of 770

Read in context
Page 711
  • उत्तरभाग * ७०९

परिक्रमा करे। मोहिनी ! उनके दर्शनसे सात जन्मोंका पाप नष्ट हो जाता है और प्रचुर पुण्य तथा अभीष्ट गतिकी प्राप्ति होती है। अब मैं उन वटस्वरूप भगवान्के प्रत्येक युगके अनुसार प्रामाणिक नाम बतलाऊँगा। वट, वटेश्वर, कृष्ण तथा पुराणपुरुष—ये सत्य आदि युगोंमें क्रमशः वटके नाम कहे गये हैं। इसी प्रकार सत्ययुगमें वटका विस्तार एक योजन, त्रेतामें पौन योजन, द्वापरमें आधा योजन और कलियुगमें चौथाई योजनका माना गया है। पहले बताये हुए मन्त्रसे वटको नमस्कार करके वहाँसे तीन सौ धनुषकी दूरीपर दक्षिण दिशाकी ओर जाय। वहाँ भगवान् विष्णुका दर्शन होता है। उसे मनोरम ‘स्वर्गद्वार’ कहते हैं।

पहले उग्रसेनका दर्शन करके स्वर्गद्वारसे समुद्रतटपर जाकर आचमन करे; फिर पवित्र भावसे भगवान् नारायणका ध्यान करे। मनीषी पुरुष ‘ॐ नमो नारायणाय’ इस मन्त्रको ही ‘अष्टाक्षर-मन्त्र’ कहते हैं। मनको भुलावेमें डालनेवाले अन्य बहुत-से मन्त्रोंकी क्या आवश्यकता; ‘ॐ नमो नारायणाय’ यह अष्टाक्षर मन्त्र ही सब मनोरथोंको सिद्ध करनेवाला है। नरसे प्रकट होनेके कारण जलको ‘नार’ कहा गया है। वह पूर्वकालमें भगवान् विष्णुका अयन (निवासस्थान) रहा है; इसलिये उन्हें ‘नारायण’ कहते हैं। समस्त वेदोंका तात्पर्य भगवान् नारायणमें ही है। सम्पूर्ण द्विज भगवान् नारायणकी ही उपासनामें तत्पर रहते हैं। ज्ञानके परम आश्रय भगवान् नारायण ही हैं तथा यज्ञकर्म भी भगवान् नारायणकी ही प्रीतिके लिये किये जाते हैं। धर्मके परम फल भगवान् नारायण ही हैं। तपस्या भगवान् नारायणकी ही प्राप्तिका उत्कृष्ट साधन है। दान भगवान् नारायणकी प्रसन्नताके लिये ही किया जाता है और व्रतके चरम लक्ष्य भी भगवान् नारायण ही हैं। सम्पूर्ण लोक भगवान् नारायणके ही उपासक हैं। देवता भगवान् नारायणके ही आश्रित हैं। सत्यका चरम फल भगवान् नारायणकी ही प्राप्ति है तथा परम पद भी नारायणस्वरूप ही है। पृथ्वी नारायणपरक है, जल नारायणपरक है, अग्नि नारायणपरक है और आकाश भी नारायणपरक है। वायुके परम आश्रय नारायण ही हैं। मनके आराध्यदेव नारायण ही हैं। अहंकार और बुद्धि दोनों नारायणस्वरूप हैं। भूत, वर्तमान तथा भविष्य जो कुछ भी जीव नामक तत्त्व है, जो स्थूल, सूक्ष्म तथा दोनोंसे विलक्षण है वह सब नारायणस्वरूप है। मोहिनी ! मैं नारायणसे बढ़कर यहाँ कुछ भी नहीं देखता। यह दृश्य-अदृश्य, चर-अचर सब उन्हींके द्वारा व्याप्त है। जल भगवान् विष्णुका घर है और वे विष्णु ही जलके स्वामी हैं; अतः जलमें सर्वदा पापहारी नारायणका स्मरण करना चाहिये। विशेषतः स्नानके समय जलमें उपस्थित हो पवित्र भावसे भगवान् नारायणका स्मरण एवं ध्यान करे। फिर विधिपूर्वक स्नान करना चाहिये। जिनके देवता जल हैं ऐसे वैदिक मन्त्रोंसे अभिषेक और मार्जन करके जलमें डुबकी लगा तीन बार अघमर्षण मन्त्रका जप करे। जैसे अश्वमेध-यज्ञ सब पापोंको दूर करनेवाला है वैसे ही ‘अघमर्षण-सूक्त’ सब पापोंका नाशक है। स्नानके पश्चात् जलसे निकलकर दो निर्मल वस्त्र धारण करे। फिर प्राणायाम, आचमन एवं संध्योपासन करके ऊपरकी ओर फूल और जलकी अञ्जलि दे, सूर्योपस्थान करे। उस समय अपनी दोनों भुजाएँ ऊपरकी ओर उठाये रखे और सूर्यदेवता-सम्बन्धी मन्त्रोंका पाठ करे। सबको पवित्र करनेवाली गायत्री देवीका एक सौ आठ बार जप करे। गायत्रीके अतिरिक्त सूर्यदेवतासम्बन्धी अन्य मन्त्रोंका भी एकाग्रचित्तसे खड़ा होकर जप करे। फिर सूर्यकी प्रदक्षिणा