संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो परम पदको प्राप्त होता है। जो मनुष्य श्वेतगङ्गामें स्नान करके श्वेतमाधव तथा मत्स्यमाधवका दर्शन करता है, वह श्वेतद्वीपमें जाता है। जो हिमके समान श्वेतवर्ण और शुद्ध हैं, जिन्होंने शङ्ख, चक्र और गदा धारण कर रखे हैं, जो समस्त शुभ लक्षणोंसे संयुक्त तथा विकसित कमलके समान विशाल नेत्रवाले हैं, जिनका वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्नसे सुशोभित है, जो अत्यन्त प्रसन्न एवं चार भुजाधारी हैं, जिनका वक्षःस्थल वनमालासे अलंकृत है, जो माथेपर मुकुट और भुजाओंमें अङ्गद धारण करते हैं, जिनके कंधे हृष्ट-पुष्ट हैं और जो पीताम्बरधारी तथा कुण्डलोंसे अलंकृत हैं, उन भगवान् (श्वेतमाधव)- का जो लोग कुशके अग्रभागसे भी स्पर्श कर लेते हैं, वे एकाग्रचित्त विष्णुभक्त मानव दिव्यलोकमें जाते हैं। जो शङ्ख, गोदुग्ध और चन्द्रमाके समान उज्ज्वल कान्तिवाली सर्वपापहारिणी माधव नामक प्रतिमाका दर्शन करता है तथा विकसित कमलके सदृश नेत्रवाली उस भगवन्मूर्तिको एक बार भक्तिभावसे प्रणाम कर लेता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग करके विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है।
श्वेतमाधवका दर्शन करके उनके समीप ही मत्स्यमाधवका दर्शन करे। वे ही पूर्वकालमें एकार्णवके जलमें मत्स्यरूप धारण करके प्रकट हुए और वेदोंका उद्धार करनेके लिये रसातलमें स्थित थे। पहले पृथ्वीका चिन्तन करके प्रतिष्ठित हुए भगवान् मत्स्यावतारका चिन्तन करना चाहिये। भगवान् लक्ष्मीपति तरुणावस्थासे युक्त मत्स्यमाधवका रूप धारण करके विराज रहे हैं। जो पवित्रचित्त होकर उन्हें प्रणाम करता है, वह सब प्रकारके क्लेशोंसे छूट जाता है और उस परम धामको जाता है जहाँ साक्षात् श्रीहरि विराजमान हैं।
शुभे! अब मैं मार्कण्डेयसरोवर एवं समुद्रमें मार्जन आदिकी विधि बतलाता हूँ। तुम भक्तिभावसे तन्मय होकर पुण्य एवं मुक्ति देनेवाले इस पुराण-प्रसङ्गको सुनो। मार्कण्डेयसरोवरमें सब समय स्नान उत्तम माना गया है, किंतु चतुर्दशीको उसका विशेष माहात्म्य है, उस दिनका स्नान सब पापोंका नाश करनेवाला है। उसी प्रकार समुद्रका स्नान हर समय उत्तम बताया गया है, किंतु पूर्णिमाको उस स्नानका विशेष महत्त्व है। उस दिन समुद्र-स्नान करनेसे अश्वमेध यज्ञका फल मिलता है। जब ज्येष्ठ मासकी पूर्णिमाको ज्येष्ठा नक्षत्र हो उस समय परम कल्याणमय तीर्थराज समुद्रमें स्नान करनेके लिये विशेषरूपसे जाना चाहिये। समुद्र-स्नानके लिये जाते समय मन, वाणी, शरीरसे शुद्ध रहना चाहिये। भीतरका भाव भी शुद्ध हो, मन भगवत्-चिन्तनके सिवा अन्यत्र न जाय। सब प्रकारके द्वन्द्वोंसे मुक्त, वीतराग एवं ईर्ष्यासे रहित होकर स्नान करना चाहिये।
कल्पवृक्ष नामक वट बड़ा रमणीय है। उसके ऊपर साक्षात् भगवान् बालमुकुन्द विराजते हैं। वहाँ स्नान करके एकाग्रचित्तसे तीन बार भगवान्की