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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished770 pages

Page 650 of 770

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Page 650

६४८ * संक्षिप्त नारदपुराण *

चलो। अकेले ही नहीं, अपनी प्रिया रानी संध्यावली और पुत्र धर्माङ्गदको भी साथ ले लो। तीनों लोकोंके लिये पूजनीय, निर्मल तथा उज्ज्वल कीर्तिकी स्थापना करके यमराजके मस्तकपर पाँव रखकर मेरे शरीरमें मिल जाओ।' ऐसा कहकर चक्रधारी भगवान्ने राजाको अपने हाथसे छू दिया। भगवान्के स्पर्शमात्रसे उनका (मोहिनीमें आसक्तिरूप) रजोगुण घुल गया। वे महात्मा नरेश अपनी पत्नी और पुत्रके साथ वेगपूर्वक समीप जा भगवान्के दिव्य शरीरमें समा गये। उस समय आकाशसे पुष्पसमूहकी वर्षा होने लगी। हर्षमें भरे हुए सिद्ध तथा देवताओंके लोकपाल दुन्दुभियाँ बजाने लगे, जिनकी आवाज सब ओर गूँज उठी। सूर्यपुत्र यमराजने यह अद्भुत दृश्य अपनी आँखोंसे देखा। राजा उनकी लिपिको मिटाकर अपनी स्त्री और पुत्रके साथ भगवान्के शरीरमें समा गये थे और सर्वसाधारण लोग भी राजाके सिखाये हुए मार्गपर स्थित होकर एकादशीका व्रत एवं भगवान्का कीर्तन आदि करते हुए वैकुण्ठके ही मार्गपर जाते थे। यह सब देखकर भयभीत हुए यमराज चतुर्मुख ब्रह्माजीके समीप पुनः जाकर बोले—'सुरलोकनाथ! अब मैं यमराजके पदपर नियुक्त नहीं होना चाहता, क्योंकि मेरी आज्ञा जगत्से उठ गयी। तात! मेरे लिये कोई दूसरा कार्य करनेकी आज्ञा प्रदान की जाय। दण्ड देनेका कार्य अब मेरे जिम्मे न रहे।'

यमराजका ब्रह्माजीसे कष्ट-निवेदन, वर देनेके लिये उद्यत देवताओंको रुक्माङ्गदके पुरोहितकी फटकार तथा मोहिनीका ब्राह्मणके शापसे भस्म होना

यमराज बोले—देवेश्वर! जगन्नाथ! चराचरगुरो! प्रभो! राजा रुक्माङ्गदकी चलायी हुई पद्धतिसे सब लोग वैकुण्ठमें ही जा रहे हैं। मेरे पास कोई नहीं आता। पितामह! कुमारावस्थासे ही सब मनुष्य एकादशीको उपवास करके पापशून्य हो भगवान् विष्णुके परमधाममें चले जाते हैं। आपकी पुत्री मोहिनीदेवी लज्जावश मूर्च्छित होकर पड़ी है, अतः आपके पास नहीं आती। सब लोग उसे धिक्कारते हैं, इसलिये वह भोजनतक नहीं कर रही है। मेरा तो सारा व्यापार ही बंद हो गया है। आज्ञा कीजिये, मैं क्या करूँ?

सूर्यपुत्र यमकी बात सुनकर कमलासन ब्रह्माजीने कहा—'हम सब लोग साथ ही मोहिनीको होशमें लानेके लिये चलें।' तदनन्तर इन्द्र आदि सब देवता ब्रह्माजीके साथ दिव्य विमानोंपर बैठकर पृथ्वीपर आये। उन्होंने विमानोंद्वारा मोहिनीको सब ओरसे घेर लिया। वह मन्त्रहीन विधि, धर्म और दयासे रहित युद्ध, भूपालरहित पृथ्वी और मन्त्रणारहित राजाकी भाँति शोचनीय अवस्थामें पड़ी थी। ममत्वयुक्त ज्ञान और दम्भयुक्त धर्मकी जैसी अवस्था होती है, वैसी ही उसकी भी थी। देवताओोंने उसे सर्वथा तेजोहीन देखा। प्रभो! वह उत्साहशून्य होकर किसी गम्भीर चिन्तनमें निमग्न थी, सब लोग उसे देखते हुए निन्दायुक्त कटुवचन सुना रहे थे। वह धर्मसे गिर गयी थी। पतिके वचनको उलटकर अपनी बात मनवानेका दुराग्रह रखनेवाली और अत्यन्त क्रोधी थी। उस अवस्थामें उससे देवताओंने कहा—'वामोरु! तुम शोक न करो। तुमने पुरुषार्थ किया है, किंतु जो भगवान् विष्णुके भक्त हैं, उनके मानका कभी खण्डन नहीं हो सकता। इसका एक कारण है, वैशाखमासके शुक्लपक्षमें जो परम पुण्यमयी मोहिनी नामवाली एकादशी आती है, वह सम्पूर्ण विघ्नोंका विध्वंस करनेवाली है। राजा रुक्माङ्गदने पहले उस एकादशीका व्रत किया था। विशाललोचने! उन्होंने एक वर्षतक पादकृच्छ्रव्रत करते हुए उसका पूजन