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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished770 pages

Page 649 of 770

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Page 649
  • उत्तरभाग * ६४७

राजाको पुत्रवधके लिये उद्यत देख मोहिनीका मूर्च्छित होना और पत्नी, पुत्रसहित राजा रुक्माङ्गदका भगवान्‌के शरीरमें प्रवेश करना

वसिष्ठजी कहते हैं—पुत्रका यह वचन सुनकर राजा रुक्माङ्गदने उस समय संध्यावलीके मुखकी ओर देखा, जो कमलके समान प्रसन्नतासे खिल उठा था। फिर मोहिनीकी बात सुनी, जिसमें एकादशीको भोजन करो, पुत्रको न मारो, यदि भोजन न करना हो तो पुत्रका वध करो। यही बार-बार आग्रह किया जा रहा था। नृपश्रेष्ठ! इसी समय कमलनयन भगवान् विष्णु अदृश्यरूपसे आकाशमें आकर ठहर गये। उनकी अङ्ग-कान्ति मेघके समान श्याम थी। वे स्वभावतः निर्मल—निर्दोष हैं। भगवान् श्रीहरि गरुड़्की पीठपर बैठकर वीर धर्माङ्गद, राजा रुक्माङ्गद तथा देवी संध्यावली—तीनोंके धैर्यका अवलोकन कर रहे थे। जब मोहिनीने पुनः 'एकादशीके दिन भोजन करो, भोजन करो' की बात दोहरायी, तब राजाने हर्षयुक्त हृदयसे भगवान् गरुडध्वजको प्रणाम करके पुत्र धर्माङ्गदको मारनेके लिये चमचमाती हुई तलवार हाथमें ले ली। पिताको खड्गहस्त देख धर्माङ्गदने माता, पिता तथा भगवान्‌को प्रणाम किया। तदनन्तर माताके उदार मुखपर दृष्टि डालकर राजकुमारने अपनी गर्दन धरतीसे सटा ली। धर्माङ्गदने उसे ठीक तलवारकी धारके सामने रखा। वे पिताके भक्त तो थे ही, माताके भी महान् भक्त थे।

राजन्! जब पुत्रने चन्द्रमाके समान मनोहर मुखको प्रसन्न रखते हुए अपनी गर्दन समर्पित कर दी और सम्पूर्ण जगत्‌के शासक महाराज रुक्माङ्गदने हाथमें तलवार उठा ली, उस समय वृक्षों और पर्वतोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वी काँपने लगी। समुद्रमें ज्वार आ गया, मानो वह तीनों लोकोंको तत्क्षण डुबो देनेके लिये उद्यत हो गया हो। पृथ्वीपर सैकड़ों उल्काएँ गिरने लगीं। आकाशमें बिजली चमक उठी और गड़गड़ाहटकी आवाज होने लगी। मोहिनीका रंग फीका पड़ गया। उसने सोचा, 'जगत्स्रष्टा विधाताने इस समय मुझे व्यर्थ ही जन्म दिया। मेरा यह विमोहक रूप विडम्बनामात्र बनकर रह गया; क्योंकि इससे प्रभावित होकर राजाने पापनाशिनी एकादशीके दिन अन्न नहीं खाया। अब तो स्वर्गलोकमें मैं तिनकेके समान हो जाऊँगी। राजामें सत्त्वगुण एवं धैर्य अधिक होनेसे ये मोक्षमार्गको चले जायेंगे, किंतु मैं पापिनी भयंकर नरकमें पडूँगी।' नृपश्रेष्ठ! इसी समय महाराज रुक्माङ्गदने तलवार ऊपर उठायी। यह देख मोहिनी मोहसे मूर्च्छित होकर धरतीपर गिर पड़ी। राजा धैर्य और हर्षसे युक्त हो पुत्रका चन्द्रमाके समान प्रकाशमान कुण्डलमण्डित मनोहर मुखयुक्त मस्तक काटना ही चाहते थे कि उसी समय भगवान् श्रीहरिने अपने हाथसे उन्हें पकड़ लिया और कहा—'राजन्! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ, बहुत प्रसन्न हूँ, अब तुम मेरे वैकुण्ठधामको