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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished770 pages

Page 638 of 770

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Page 638

६३६ * संक्षिप्त नारदपुराण *


ब्राह्मणको नीचे गिरायेगा, कौन पर-स्त्री-गमन करेगा और कौन एकादशीको अन्न खायेगा ?

मोहिनीने कहा—घूर्णिके! तुम शीघ्र जाकर वेद-विद्याके पारङ्गत ब्राह्मणोंको यहाँ बुला लाओ, जिनके वाक्यसे प्रेरित होकर ये राजा एकादशीको भोजन करें।

उसकी बात सुनकर घूर्णिका गयी और वेद-विद्यासे सुशोभित गौतम आदि ब्राह्मणोंको बुलाकर मोहिनीके पास ले आयी। उन वेद-वेदाङ्गके पारङ्गत ब्राह्मणोंको आया देख राजासहित मोहिनीने प्रणाम किया। वह अपना काम बनानेके प्रयत्नमें लग गयी थी। महीपाल! प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी वे सब ब्राह्मण सोनेके सिंहासनोंपर बैठे। तदनन्तर उनमेंसे वयोवृद्ध ब्राह्मण गौतमने कहा—‘देवि! सब प्रकारके संदेहका निवारण करनेवाले तथा अनेक शास्त्रोंमें कुशल हम सब ब्राह्मण यहाँ आ गये हैं। जिसके लिये हमें बुलाया गया है वह कारण बताइये।' उनकी बात सुनकर मोहिनी बोली।

मोहिनीने कहा—ब्राह्मणो! हमारा यह संदेह तो जड़तापूर्ण है; साथ ही छोटा भी है। इसपर अपनी बुद्धिके अनुसार आप लोग प्रकाश डालें। ये राजा कहते हैं—मैं एकादशीके दिन भोजन नहीं करूँगा, किंतु यह सर्वोत्तम अमृत है, भूखी हुई चींटी भी मुखसे चावल लेकर बड़े कष्टसे अपने बिलके भीतर जाती है। भला, अन्न किसको अच्छा नहीं लगता। ये महाराज एकादशी प्राप्त होनेपर खाना-पीना बिलकुल छोड़ देते हैं; किंतु व्रतका सेवन विधवाओं और यतियोंके लिये ही उचित होता है। राजाका धर्म है प्रजाकी रक्षा करना। वह धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—चारों पुरुषार्थोंका फल देनेवाला है। स्त्रियोंके लिये पतिसेवा, पुत्रोंके लिये माता-पिताकी सेवा, शूद्रोंके लिये द्विजोंकी सेवा तथा राजाओंके लिये सम्पूर्ण जगत्‌की रक्षा स्वधर्म है। जो अपने धर्मानुकूल कर्मका परित्याग करके अज्ञान अथवा प्रमादवश परधर्मके लिये कष्ट उठाता है, वह निश्चय ही पतित है। इन राजाका शरीर तो अत्यन्त क्षीण हो गया है; फिर ये एकादशीके दिन संयम-नियमका पालन कैसे करेंगे? अन्नसे ही प्राणकी पुष्टि होती है और सम्पूर्ण चराचर जगत् अन्नके ही आधारपर टिका है। मरे हुए पितर भी अन्नद्वारा श्राद्ध करनेपर स्वर्गलोकमें तृप्ति एवं प्रसन्नताका अनुभव करते हैं। द्विजवरो! स्वर्गके देवता बेरके बराबर पुरोडाशकी भी आहुति पानेकी इच्छा रखते हैं, अतः अन्न प्राणसे शरीरमें विशेषरूपसे चेष्टाकी शक्ति आती है। चेष्टासे शत्रु‌का नाश होता है। जो चेष्टा या पुरुषार्थसे रहित है, उसका पराभव होता है। ऐसा जानकर मैं राजाको बराबर समझाती हूँ, परंतु ये समझ नहीं पाते।