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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished770 pages

Page 637 of 770

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Page 637
  • उत्तरभाग * | ६३५
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आदर होना चाहिये। सत्यसे ही सूर्य तपता है, सत्यसे ही चन्द्रमा प्रकाशित होते हैं। भूपाल! सत्यपर ही यह पृथ्वी टिकी हुई है और सत्य ही सम्पूर्ण जगत्‌को धारण करता है। सत्यसे वायु चलती है, सत्यसे आग जलती है और इस सम्पूर्ण चराचर जगत्‌का आधार सत्य ही है। सत्यके ही बलसे समुद्र अपनी मर्यादाके आगे नहीं बढ़ता। राजन्! सत्यसे ही बँधकर विंध्यपर्वत ऊँचा नहीं उठता और सत्यके ही प्रभावसे युवती स्त्री समय बीतनेपर कभी गर्भ नहीं धारण करती। सत्यमें स्थित होकर ही वृक्ष समयपर फूलते-फलते दिखायी देते हैं। महीपते! मनुष्योंके लिये दिव्यलोक आदिके साधनका आधार भी सत्य ही है। सहस्रों अश्वमेध-यज्ञोंसे भी बढ़कर सत्य ही है। यदि आप असत्यका आश्रय लेंगे तो मदिरापानके तुल्य पातकसे लिप्त होंगे।


राजा रुक्माङ्गदद्वारा मोहिनीके आक्षेपोंका खण्डन, एकादशीव्रतकी वैदिकता, मोहिनीद्वारा गौतम आदि ब्राह्मणोंके समक्ष अपने पक्षकी स्थापना

राजा बोले—वरानने! गिरिश्रेष्ठ मन्दराचलपर एकादशीको भोजन करनेके विषयमें तुमने जो महर्षि गौतमकी कही हुई बात बतायी है, वह कथन पुराणसम्मत नहीं है। पुराणमें तो विद्वानोंका किया हुआ यह निर्णय स्पष्टरूपसे बताया गया है कि एकादशी तिथिको भोजन न करे। फिर मैं एकादशीको भोजन कैसे करूँगा? एकादशीके दिन क्षीणकाय पुरुषोंके लिये मुनीश्वरोंने फल, मूल, दूध और जलको अनुकूल एवं भोज्य बताया है। एकादशीको किसीके लिये अन्नका भोजन किन्हीं महापुरुषोंने नहीं कहा है। जो लोग ज्वर आदि रोगोंके शिकार हैं उनके लिये तो उपवास और उत्तम बताया गया है। धार्मिक पुरुषोंके लिये एकादशीके दिन उपवास शुभ एवं सद्गति देनेवाला कहा गया है। अतः तुम भोजन करनेके लिये आग्रह न करो, इससे मेरा व्रत भङ्ग हो जायगा। इसके सिवा, तुम्हें जो भी रुचिकर प्रतीत हो, वह कार्य मैं अवश्य करूँगा।

मोहिनीने कहा—राजन्! आप एकादशीको भोजन करें, इसके सिवा दूसरी कोई बात मुझे अच्छी नहीं लगती। एकादशीके दिन यह उपवासका विधान वेदोंमें नहीं देखा जाता है।

भूपते! मोहिनीकी यह बात सुनकर वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ राजा रुक्माङ्गद मनमें तो कुपित हुए; परंतु बाहरसे हँसते हुए-से बोले—'मोहिनी! मेरी बात सुनो! वेद अनेक रूपोंमें स्थित है। यज्ञ आदि कर्मकाण्ड वेद है, स्मृति वेद है और ये दोनों प्रकारके वेद पुराणोंमें प्रतिष्ठित हैं। अतः वरानने! मैं वेदार्थसे अधिक पुराणार्थको मान्यता देता हूँ। जो शास्त्रको बहुत कम जानता है, उससे वेद डरता है कि 'यह कहीं मुझपर ही प्रहार न कर बैठे।' सब विषयोंका निर्णय इतिहास और पुराणोंने पहलेसे ही कर रखा है। वेदोंमें जो नहीं देखा गया, वह सब स्मृतिमें दृष्टिगोचर होता है। वेदों और स्मृतियोंमें भी जो बात नहीं देखी गयी है, उसका वर्णन पुराणोंने किया है। प्रिये! हत्या आदि पापोंका प्रायश्चित्त तथा रोगीके औषधका वर्णन भी पुराणोंमें मिलता है। उन प्रायश्चित्तोंके बिना पापकी शुद्धि नहीं हो सकती। सुभ्रू! वेदों, वेदके उपाङ्गों, पुराणों तथा स्मृतियोंद्वारा जो कुछ कहा जाता है, वह सब वेदमें ही बताया गया है—ऐसा मानना चाहिये। वरानने! पुराण बार-बार यह दोहराते हैं कि एकादशी प्राप्त होनेपर भोजन नहीं करना चाहिये, नहीं करना चाहिये।' पिताको कौन नहीं प्रणाम करेगा, कौन माताकी पूजा नहीं करेगा, कौन सरिताओंमें श्रेष्ठ गङ्गाके समीप नहीं जायगा और कौन है जो एकादशीको भोजन करेगा? कौन वेदकी निन्दा करेगा, कौन