संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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समीप जा पहुँचे। तत्पश्चात् उन्होंने समस्त मृग आदि पशुओं और पक्षियोंके समुदायको एक संगीतकी ध्वनिसे खिंचकर शीघ्रतापूर्वक एक ओर जाते देखा। वह ध्वनि मोहिनीके मुखसे निकले हुए संगीतकी थी। उनको जाते देख राजा रुक्माङ्गद स्वयं भी उन्हींके साथ शीघ्रतापूर्वक चल दिये। मोहिनीके मुखसे निकले हुए संगीतकी ध्वनि राजाके भी कानमें पड़ी, जिससे मोहित होकर उन्होंने घोड़ा वहीं छोड़ दिया और पर्वतीय मार्गको लाँघते हुए वे क्षणभरमें सहसा उसके पास पहुँच गये। उन्होंने देखा, तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिवाली एक दिव्य नारी पर्वतपर बैठी है, मानो गिरिराजनन्दिनी पार्वतीकी रूपराशि उसके रूपमें अभिव्यक्त हुई हो। उसे देखकर राजा उसके पास खड़े हो उस मोहिनीका रूप निहारने लगे। देखते-देखते वे मोहित होकर वहीं गिर पड़े। मोहिनीने वीणाको रख दिया और गीत बन्द कर दिया। वह देवी राजाके समीप गयी। मोहिनी सन्तप्त राजा रुक्माङ्गदसे मधुर मनोरम वचनोंमें बोली—'राजन्! उठिये। मैं आपके वशमें हूँ। क्यों मूर्च्छासे आप अपने इस शरीरको क्षीण कर रहे हैं। भूपाल! आप तो पृथ्वीके इस महान् भारको तिनकेके समान समझकर ढोते आये हैं। फिर आज आप मोहित क्यों हो रहे हैं? दृढ़तापूर्वक अपनेको सँभालिये। आप धीर हैं, वीर हैं। आपकी चेष्टाएँ उदारतापूर्ण हैं। राजराजेश्वर! यदि मेरे साथ अत्यन्त मनोरम एवं मनोऽनुकूल क्रीड़ा करनेकी आपके मनमें इच्छा हो तो मुझे धर्मयुक्त दान देकर अपनी दासीकी भाँति मेरा उपभोग कीजिये।'
राजाकी मोहिनीसे प्रणय-याचना, मोहिनीकी शर्त तथा राजाद्वारा उसकी स्वीकृति एवं विवाह तथा दोनोंका राजधानीकी ओर प्रस्थान
वसिष्ठजी कहते हैं— मोहिनीके इस प्रकार सुन्दर वचन बोलनेपर राजा रुक्माङ्गद आँखें खोलकर गद्गद कण्ठसे बोले—'बाले! मैंने पूर्ण चन्द्रमाके समान सुन्दर मुखवाली बहुत-सी रमणियोंको देखा, किंतु ऐसा रूप मैंने कहीं नहीं देखा है, जैसा कि विश्वविमोहन रूप तुमने धारण किया है। वरानने! मैं तुम्हारे दर्शनमात्रसे इतना मोहित हो गया कि तुमसे बाततक न कर सका