Skip to content
SarvaKosh
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished770 pages

Page 613 of 770

Read in context
Page 613

* उत्तरभाग *
६११

वामदेवजीने कहा- महीपाल! तुम पूर्वजन्ममें शूद्रजातिमें उत्पन्न हुए थे। उस समय दरिद्रता तथा दुष्ट भार्याने तुम्हारा बड़ा तिरस्कार किया था। तुम्हारी स्त्री पर-पुरुषका सेवन करती थी। राजन्! तुम ऐसी स्त्रीके साथ बहुत वर्षोंतक निवास करते हुए दुःखसे संतप्त होते रहे। एक समय किसी ब्राह्मणके संसर्गसे तुम तीर्थयात्राके लिये गये; फिर सब तीर्थोंमें घूमकर ब्राह्मणकी सेवामें तत्पर हो, तुम पुण्यमयी मथुरापुरीमें जा पहुँचे। महीपते! वहाँ ब्राह्मणदेवताके सङ्गसे तुमने यमुनाजीके सब तीर्थोंमें उत्तम-विश्रामघाट नामक तीर्थमें स्नान करके भगवान् वाराहके मन्दिरमें होती हुई पुराणकी कथा सुनी, जो 'अशून्यशयनव्रत'के विषयमें थी; चार पारणसे जिसकी सिद्धि होती है, जिसका अनुष्ठान कर लेनेपर मेघके समान श्यामवर्ण देवेश्वर लक्ष्मीभर्ता जगन्नाथ, जो अशेष पापराशिका नाश करनेवाले हैं, प्रसन्न होते हैं। राजन्! तुमने अपने घर लौटकर वह पवित्र 'अशून्यशयनव्रत' किया, जो घरमें परम अभ्युदय प्रदान करनेवाला है। महीपते! श्रावण मासकी द्वितीयाको यह पुण्यमयव्रत ग्रहण करना चाहिये। इससे जन्म, मृत्यु और जरावस्थाका नाश होता है। पृथ्वीपते! इस व्रतमें फल, फूल, धूप, लाल-चन्दन, शय्यादान, वस्त्रदान और ब्राह्मणभोजन आदिके द्वारा लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णुकी पूजा करनी चाहिये। राजन्! तुमने यह सब दुस्तर कर्म भी पूरा किया। महीपते! तुमने जो पहले पुण्यके फलस्वरूप सुख विस्तारपूर्वक बताये हैं, वे इसी व्रतसे प्राप्त हुए हैं, सुनो-जिसके ऊपर भगवान् जगन्नाथ प्रसन्न न हों, उसके यहाँ वे सुख निश्चय ही नहीं हो सकते। राजेन्द्र ! इस जन्ममें भी तुम (एकादशीसंयुक्त) द्वादशीव्रतके द्वारा श्रीहरिकी पूजा करते हो। राजन्! इससे तुम्हें निश्चितरूपसे भगवान् विष्णुका सायुज्य प्राप्त होगा।

राजा बोले- द्विजश्रेष्ठ! आपकी आज्ञा हो तो मैं मन्दराचलपर जानेको उत्सुक हूँ। राज्य-शासनका गुरुतर भार अपने पुत्रके ऊपर छोड़कर मैं हलका हो गया हूँ। अब मेरे कर्तव्यका पालन मेरा पुत्र करेगा।

राजाकी बात सुनकर वामदेवजी इस प्रकार बोले- 'नृपश्रेष्ठ ! पुत्रका यह सबसे महान् कर्तव्य है कि वह सदा प्रेमपूर्वक पिताको क्लेशसे मुक्त करता रहे। जो मन, वाणी और शरीरकी शक्तिसे सदा पिताकी आज्ञाका पालन करता है, उसे प्रतिदिन गङ्गास्नानका फल मिलता है। जो पिताकी आज्ञाका उल्लङ्घन करके गङ्गास्नान करनेके लिये जाता है, उस पुत्रकी शुद्धि नहीं होती- यह वैदिक श्रुतिका कथन है*। भूपाल! तुम इच्छानुसार यात्रा करो। तुमने अपना सब कर्तव्य पूरा कर लिया।'

मुनिके ऐसा कहनेपर श्रीमान् राजा रुक्माङ्गद घोड़ेपर चढ़कर शीघ्र गतिसे चले, मानो साक्षात् वायुदेव जा रहे हों। मार्गमें अनेकानेक पर्वत, वन, नदी, सरोवर तथा उपवन आदि सम्पूर्ण आश्चर्यमय दृश्योंको देखते हुए वे राजाधिराज रुक्माङ्गद थोड़े ही समयमें श्वेतगिरि, गन्धमादन और महामेरुको लाँघकर उत्तर-कुरुवर्षको देखते हुए मन्दराचलपर्वतपर जा पहुँचे, जो सब ओरसे सुवर्णसे आच्छादित था। वहाँ बहुत-से निर्झर झर रहे थे। अनेकानेक कन्दराएँ उस पर्वतकी शोभा बढ़ा रही थीं। सहस्रों नदियोंसे पूर्ण मन्दराचल गङ्गाजीके शुभ जलसे भी प्रक्षालित हो रहा था। यह सब देखते हुए राजा रुक्माङ्गद उस महापर्वतके


* एतद्धि परमं कृत्यं पुत्रस्य नृपपुङ्गव । यत्क्लेशात् पितरं प्रेम्णा विमोचयति सर्वदा ॥
पितुर्वचनकारी च मनोवाक्कायशक्तिः । तस्य भागीरथीस्नानमह्न्यहनि जायते ॥
निरस्य पितृवाक्यं तु व्रजेत्स्नातुं सुरापगाम् । नो शुद्धिस्तस्य पुत्रस्य इतीत्थं वैदिकी श्रुतिः ॥
(ना० उत्तर० ११। २-२३)